भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

गीतावली १४० रहे रघुनाथकी निकाई नीकी नीके नाथ, हाथ सो तिहारे करतूति जाकी नई है ॥ ५ ॥ कहि 'साधु' साधु, गाधि-सुवन सराहे राउ, 'महाराज ! जानि जिय ठीक भली दई है' । हरषे लखन, हरखाने बिलखाने लोग, तुलसी मुदित जाको राजा राम जई है ॥ ६ ॥ जनकजी सोचते हैं—'बड़ा बुरा पेंच आ पड़ा है।' वे श्रीविश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर निहोरा करते हुए कहने लगे— 'भगवन् ! आपने जो रामको आज्ञा दी है, उसके सम्बन्धमें मुझे सन्देह हो रहा है। बाणासुर, राक्षसराज रावण, सातों द्वीपोंके नृपतिगण और लोकपालोंके देखते ही इस धनुषने मानो पृथ्वीको पकड़ लिया है। जिस प्रकार ज्योतिर्लिङ्गकी कथा सुनकर [उसका अन्त पानेके लिये स्वर्ग और पातालमें जानेपर भी] ब्रह्मा और विष्णु अन्तमें उसका पार न पाकर लौट आये थे, वही हाल इस धनुषका भी हुआ है ॥ १-२ ॥ आप ही विचारिये और इस समय सभाकी गति देखिये। ऐसा जान पड़ता है। मानो हेतुवाद (तर्कवाद) ने वेदकी मर्यादा नष्ट कर दी हो। इन बालकोंका तो, जैसा मन प्रसन्न है वैसी ही शरीरकी शोभा बढ़ी हुई है तथा इनके मुखोंकी सुन्दरता भी अति सुखदायिनी जान पड़ती है ॥ ३ ॥ इनकी जो प्रसन्नता है वह या तो आपके भरोसेका बल है, या ये कोई छल किये हुए देवता हैं, या इनके कुछ (सूर्यवंश) का प्रभाव है, या केवल बालकपन है अथवा विधाताने मेरी कन्या सीता तथा विश्वव्यापिनी कीर्ति और विजयको बटोरकर कहीं इन्हींके लिये तो