गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ बालकाण्ड रघुनाथजीने हृदयमें हँसकर लक्ष्मणजीको रोक दिया। उस समय वे शील, संकोच और स्नेहवश झुकी हुई ग्रीवासे सुशोभित होने लगे ॥ ३ ॥ इससे सारी सभा सहम गयी, जनकजी प्रेमविह्वल हो गये तथा विश्वामित्रजीने रामचन्द्रजीकी ओर देखकर उन्हें आशीर्वाद और धनुर्भङ्गके लिये आज्ञा दी। तुलसीदास कहते हैं, फिर स्वभावसे ही गुरुके चरणोंमें गिरकर रघुनाथजीने ऋषिराजकी आज्ञा सिरपर धारण कर ली ॥ ४ ॥ [ ८६ ] सोचत जनक पोच पेच परि गई है। जोरि कर कमल निहोरि कहैं कौसिकसों, आयसु भौ रामको सो मेरे दुचितई है ॥ १ ॥ बान, जातुधानपति, भूप दीप सातहूके, लोकप बिलोकत पिनाक भूमि लई है। जोतिलिंग कथा सुनि जाको अंत पाये बिनु आए बिधि हरि हारि सोई हाल भई है ॥ २ ॥ आपुही बिचारिये, निहारिये, सभाकी गति, बेद-मरजाद मानौ हेतुबाद हई है। इन्हके जितौहैं मन, सोभा अधिकानी तन, मुखनकी सुखमा सुखद सरसई है ॥ ३ ॥ रावरो भरोसो बल, कै है कोऊ कियो छल, कैधों कुलको प्रभाव, कैधों लरिकई है ? । कन्या, कल कीरति, बिजय बिस्वकी बटोरि कैधों करतार इन्हहींको निरमई है ॥ ४ ॥ पनको न मोह, न बिसेष चिंता सीताहूकी, लुनिहै पै सोई सोई जोई जेहि बई है।