गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १३८ मेरो अनुचित न कहत लरिकाई-बस, पन परमिति और भाँति सुनि गई है। नतरु प्रभु-प्रताप उतरु चढ़ाय चाप देतो पै देखाइ बल, फल पापमई है ॥ २ ॥ भूमिके हरैया उखरैया भूमिधरनके, विधि बिरचे प्रभाउ जाको जग जई है। बिहँसि हिये हरषि हटके लषन राम, सोहत सङ्कोच सील नेह नारि नई हैं ॥ ३ ॥ सहमी सभा सकल, जनक भए बिकल राम लखि कौसिक असीस-आग्या दई है। तुलसी सुभाय गुरुपाँय लागि रघुराज ऋषिराजकी रजाइ माथे मानि लई है ॥ ४ ॥ लक्ष्मणजी बोले—'महाराज जनकने जो कुछ कहा है वह सब बहुत ठीक है। इस बहुत बड़े समाजमें आज राजाओंकी सारी लाज और इज्जत इस अकेले धनुषने चुनौती देकर छीन ली है ॥ १ ॥ मैं अपने लड़कपनसे कुछ कहता हूँ, उसे अनुचित न मानें, इस धनुर्भङ्गका फल और ही प्रकारसे सुना गया है; नहीं तो प्रभुके प्रतापसे इस धनुषको चढ़ाकर ही मैं जनकजीको उत्तर देता । मैं अपना बल अवश्य दिखा देता; परन्तु [करूँ क्या ?] इससे प्राप्त होनेवाला फल पापमय है [क्योंकि जगज्जननी सीताजी तो मेरी माताके समान हैं] ॥ २ ॥ इस समय विधाताने इस धनुषका 'प्रभाव भूमिका हरण करनेवाले बाणासुरादि तथा पर्वतोंके उखाड़ने- वाले रावणादिके सहित सम्पूर्ण जगत्को जीतनेवाला बना दिया है। [ परन्तु मैं तो इसे कुछ भी नहीं समझता ]।' यह सुनकर