गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३७ | बालकाण्ड निमेष भूलकर मृग और मृगियोंके समान चकित-से रह गये ॥ ६ ॥ इसी समय बन्दीजन [धनुष न टूटनेसे] हानि, [धनुर्भङ्गसे सीताजी- की प्राप्तिरूप] लाभ, [बहुत बल करनेपर भी धनुर्भङ्ग न कर सकनेके कारण राजाओंको हुआ,] अनख, [जो धनुष तोड़ेगा उसे सीताजी मिलेंगी—ऐसा कहकर] उत्साह तथा [रावण-बाणासुरादि विश्वविजयी योद्धाओंके भी दाँत खट्टे करनेवाले धनुषको जो तोड़ेगा उसके] बाहुबलका बखान करके प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करते हुए विरुदावली कहने लगे और बोले, 'इस समय महाराज जनककी दृढ़ प्रतिज्ञा सुनकर द्वीप-द्वीपान्तरके राजा लोग आये हुए हैं; सो उसे पूरी करें; अब पुरुषार्थका समय उपस्थित हो गया है' ॥ ७ ॥ उसे सुनकर राजाओंमें परस्पर आनाकानी, कण्ठ-हँसी (भीतर-ही-भीतर हँसना) तथा कानाफूसी होने लगी। इस दशाको देखकर महाराज जनक बिलखकर कहने लगे—'हे नृपतिगण ! आप अपने घरोंको जाइये और अपना अगला कार्य तो सँभालिये [यह कार्य तो आपलोगों से हो चुका], अब आप धनुषकी पूजाकर अपनी विजयका घोष कीजिये' ॥ ८ ॥ जनकजीके ये वचन सुन वे सब वीर लज्जावती (छुईमुई) के पौधोंके समान संकोचवश सिर झुकाकर रह गये। तुलसीदासजी कहते हैं, इन वाक्योंसे लक्ष्मणजी भी खीझ गये, किन्तु रामचन्द्रजीका रुख देखकर, अपने स्वभावके अनुकूल रोष करते हुए कुछ मधुर और कुछ कठोर वचन बोले ॥ ९ ॥ [ ८५ ] भूपति बिदेह कही नीकियै जौ भई है। बड़े ही समाज आजु राजनिकीं लाज-पति हाँकि झाँक एक ही पिनाक छीनि लई है ॥ १ ॥