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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 454 में से

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गीतावली १३६ आज राजा लोग अपने-अपने साज और अपने-अपने सुन्दर वेष बनाकर रङ्गभूमिमें अपने-अपने स्थानोंपर जाकर बैठ गये हैं ॥ १ ॥ इसी समय महाराज जनकने, जिनके अति सुन्दर राम और लक्ष्मण नाम हैं, उन महामनोहर बालकोंको विश्वामित्रजीके सहित बुला भेजा। उनके दर्शनोंकी लालसासे पुरवासी लोग भले भावसे प्रसन्नवदन होकर अपने-अपने घरोंसे निकल-निकलकर दौड़ पड़े ॥ २ ॥ तब जनकजीने अपने छोटे भाई कुशध्वजके सहित आनन्दित हो आगे आकर उनका स्वागत किया तथा आदरपूर्वक धनुर्यज्ञकी समस्त रुचिर रचना दिखाकर उन्हें दिव्य आसन दिये, जिनपर सब प्रकारका सुपास और सावकाश था तथा अलग-अलग अच्छे-अच्छे बिछौने बिछे हुए थे ॥ ३ ॥ [दर्शकगण कहते हैं—] 'अहा ! दोनों ओर राजकुमार हैं और बीचमें मुनिराज विश्वामित्रजी विराजमान हैं। यह इन्हें देखनेका बड़ा अच्छा अवसर है; इसलिये और सब देखना छोड़कर इन्हींका दर्शन करो। ये दोनों सुन्दर राजकुमार ऐसे जान पड़ते हैं, मानो उदयाचलपर प्रातःकालीन सूर्य अपनी सहस्र किरणोंको छिपाकर उदित हुआ हो ॥ ४ ॥ जनकपुर- में बड़ा कौतुक तथा निशान और गानका कोलाहल हो रहा है तथा आकाशमें देवताओंके विमान छाये हुए हैं, जिनसे फूलोंकी वर्षा हो रही है मित्र-शत्रु, रागी-विरागी—ये सब इन बालकोंको देखकर अपना जन्मफल पाकर प्रेम और आनन्दमें मग्न हो रहे हैं ॥ ५ ॥ फिर महाराज जनककी आज्ञा पा मन्त्रिवर्ग और सहेलियाँ दौड़ीं तथा शतानन्दजी सीताजीको पालकीपर चढ़ाकर ले आये । श्रीजानकीजीके सौन्दर्यरूपी दीपकको निहारकर सब नर-नारी नेत्रोंके

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