गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १४४ प्रभुका भजन करनेमें भी भला कौन कुशल है ? ॥ २ ॥ इनका कथन और रहन-सहन एक समान हैं। ये वैराग्य, विवेक, नीति तथा निर्वाणपदके बुधजनसम्मत पथिक हैं। इन्होंने बिना रस्सीकी जड़चेतनकी कठिन ग्रन्थिको अनायास ही खोल दिया है। इनके समान अपने स्वरूपका अच्छी प्रकार शोधन करनेवाला और कौन है ? ॥ ३ ॥ रघुनाथजीकी वाक्यरचनाकी रीति सुनकर उससे सकुचाकर जनकजी प्रातःकालीन दीपकके समान हतप्रभ हो गये। उनके चित्तका महामोह मिट गया, सीताजीकी ओरसे उनकी क्षुद्र चिन्ता दूर हो गयी और उन्हें विदित हो गया कि पुराणपुरुषका अवतार हुआ है ॥ ४ ॥ इस समय सभा, महाराज जनक, गुरु, नगरके नर-नारी और आकाशस्थित देवगण—ये सब करुणानिधान भगवान् रामका मुख निहारने लगे और एक-दूसरेसे प्रेमवश प्रकटरूप से कहने लगे—'हे तुलसीश ! आप भगवान् शङ्करका धनुष तोड़िये' ॥ ५ ॥ राग मारू [ ८९ ] सुनो भैया भूप सकल दै कान। बज्ररेख गजदसन जनक-पन बेद-बिदित, जग जान ॥ १ ॥ घोर कठोर पुरारि-सरासन, नाम प्रसिद्ध पिनाकु । जो दसकंठ दियो बाँवों जेहि हर-गिरि कियो है मनाकु ॥ २ ॥ भूमि भाल भ्राजत, न चलत सो, ज्यों बिरंचिको आँकु । धनु तोरै सोइ बरै जानकी, राउ होइ कि राँकु ॥ ३ ॥ सुनि आमरषि उठे अवनीपति, लगै बचन जनु तीर । टरै न चाप, करैं अपनी सौ महा महा बलधीर ॥ ४ ॥