गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४५ बालकाण्ड नमित-सीस सोचहिं सलज्ज सब श्रीहत भए सरीर। बोले जनक बिलोकि सीय तन दुखित सरोष अधीर॥ ५॥ सप्त दीप नव खंड भूमिके भूपतिबृन्द जुरे। बड़ो लाभ कन्या-कीरतिको, जहँ-तहँ महिप मुरे॥ ६॥ डग्यौ न धनु, जनु बीर बिगत महि, किधौं कहुँ सुभट दुरे। रोषे लखन बिकट भृकुटी करि, भुज अरु अधर फुरें॥ ७॥ सुनहु भानुकुल-कमल-भानु! जो अब अनुसासन पावौं। का बापुरो पिनाकु, मेलि गुन मंदर मेरु नवावौं॥ ८॥ देखो निज किंकरको कौतुक, क्यों कोदंड चढ़ावौं। लै धावौं, भंजौं मृनाल ज्यों, तौ प्रभु-अनुग कहावौं॥ ६॥ हरषे पुर-नर-नारि, सचिव, नृप कुंवर कहे बर बैन। मृदु मुसुकाइ राम बरज्यो प्रिय बंधु नयनकी सैन॥ १०॥ कौसिक कह्यो, उठहु रघुनंदन, जगबंदन, बलऐन। तुलसिदास प्रभु चले मृगपति ज्यों निज भगतनि सुख दैन॥ ११॥ [बन्दीजन कहने लगे—] 'अरे भैया! सब राजा लोगो! कान देकर सुनो। राजा जनकका प्रण वज्ररेखा और हाथीके दाँतोंके समान [अमिट एवं पीछेको न लौटनेवाला] है। वह वेदमें प्रसिद्ध है और उसे सारा जगत् जानता है॥ १॥ श्री- महादेवजीका यह 'पिनाक' नामसे प्रसिद्ध धनुष बड़ा ही घोर और कठोर है; इसने उस रावणको भी नीचा दिखा दिया है, जिसने कैलास पर्वतको भी तुच्छ कर दिखलाया था॥ २॥ यह पृथ्वीके मस्तकपर विराजमान है और विधाताके लेखके समान तनिक भी नहीं टलता। परन्तु राजा हो या रङ्क, जो कोई इस धनुषको तोड़ेगा वही जानकीजीको वरेगा'॥ ३॥ यह सुनकर सब राजा लोग गी० १०—