गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 152, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १४६ उत्तेजित होकर उठ खड़े हुए; उन्हें जनकजीके ये वचन तीरके समान लगे। ये बड़े-बड़े बलधारी अपनी-अपनी-सी कर रहे हैं। परन्तु धनुष तनिक भी नहीं टलता॥४॥ तब सब लोग सलज्जभावसे सिर झुकाकर सोच करने लगे और उनके शरीर श्रीहीन हो गये। इस समय महाराज जनकने सीताजीकी ओर देखकर दुःखित, रुष्ट और अधीर होकर कहा—॥५॥ 'अहो! सातों द्वीपों और नवों खण्डोंके राजा लोग एकत्र हुए। उन्हें कन्या और कीर्तिका बड़ा भारी लाभ भी प्राप्त हो सकता था, किन्तु वे सभी जहाँ-तहाँ धनुषके सामनेसे मुड़ गये॥६॥ उनसे धनुष तनिक भी नहीं डिगा। पृथ्वी मानो वीरहीन हो गयी है अथवा सारे वीर कहीं छिप तो नहीं गये हैं?' यह सुनकर लक्ष्मणजी भृकुटियोंको टेढ़ी कर बड़े क्रुद्ध हुए तथा उनकी भुजा और अधर फड़कने लगे॥७॥ [वे बोले—] 'हे सूर्यकुलकमलदिवाकर! सुनिये, यदि इस समय आपकी आज्ञा मिले तो बेचारा धनुष तो क्या, मन्दराचल और सुमेरुको भी डोरी चढ़ाकर झुका दूँ!॥८॥ आप तनिक अपने सेवकका खेल देखिये तो कि मैं किस प्रकार इस धनुषको चढ़ाता हूँ, यही क्यों, मैं तो इसे लेकर दौड़ूँ और कमल- नालके समान तोड़ डालूँ, तभी आपका दास कहलाऊँगा'॥९॥ यह सुनकर नगरके सकल नर-नारी तथा मन्त्रिवर्ग और राजालोग प्रसन्न हुए और कहने लगे, 'राजकुमारने बड़े ही सुन्दर वचन कहे हैं।' किन्तु रघुनाथजीने मधुर-मधुर मुसकराते हुए नेत्रोंके इशारेसे अपने प्रिय बन्धुको रोक दिया॥१०॥ तब विश्वामित्रजीने कहा, 'हे जगद्वन्द्य बलधाम रघुनाथजी! उठिये।' तुलसीदासजी कहते