भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

१४७ बालकाण्ड हैं, यह सुनकर प्रभु अपने भक्तोंको सुख देनेके लिये मृगराजके समान चले ॥ ११ ॥ [ ९० ] जबहिं सब नृपति निरास भए। गुरुपद-कमल बंदि रघुपति तब चाप-समीप गए ॥ १ ॥ स्याम-तामरस-दाम-बरन बपु, उर-भुज-नयन बिसाल। पीत बसन कटि, कलित कंठ सुंदर सिंधुर-मनिमाल ॥ २ ॥ कल कुंडल, पल्लव प्रसून सिर चारु चौतनी लाल। कोटि-मदन-छबि-सदन बदन-बिधु, तिलक मनोहर भाल ॥ ३ ॥ रूप अनूप बिलोकत सादर पुरजन राजसमाज। लषन कह्यो थिर होहु धरनिधरु, धरनि, धरनिधर आज ॥ ४ ॥ कमठ, कोल, दिग-दंति सकल अँग सजग करहु प्रभु-काज। चहत चपरि सिव-चाप चढ़ावन दसरथको जुवराज ॥ ५ ॥ गहि करतन, मुनि, पुलक सहित, कौतुकहि, उठाइ लियो। नृपगन-मुखनि समेत नमित करि संजि सुख सबहि दियो ॥ ६ ॥ आकर्ष्यो सिय-मन समेत हरि, हरष्यो जनक-हियो। भंज्यौ भृगुपति-गरब सहित, तिहुँ लोक-बिमोह कियो ॥ ७ ॥ भयो कठिन कोदंड-कोलाहल प्रलय-पयोद समान। चौंके सिव, बिरंचि, दिसिनायक, रहे मूंदि कर कान ॥ ८ ॥ सावधान ह्वै चढ़े बिमाननि चले बजाइ निसान। उमगि चल्यो आनंद नगर, नभ जयधुनि, मंगलगान ॥ ९ ॥ बिप्र-बचन सुनि सुखी सुआसिनि चलीं जानकिहि ल्याइ। कुँवर निरखि, जयमाल मेलि उर कुंवरि रही सकुचाइ ॥ १० ॥ बरषहिं सुमन, असीसहिं सुर-मुनि प्रेम न हृदय समाइ। सीय-रामकी सुंदरतापर तुलसिदास बलि जाइ ॥ ११ ॥