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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली १४८ जिस समय सब राजालोग निराश हो गये, उसी समय श्री- रघुनाथजी गुरुवर विश्वामित्रके चरणकमलोंकी वन्दना कर धनुषके समीप आये ॥ १ ॥ प्रभुका नीलकमलकी मालाके समान श्याम शरीर है, उनके हृदय, भुजा और नेत्र विशाल हैं, कमरमें पीताम्बर तथा कलित कण्ठमें गजमुक्ताओंकी मनोहर माला है ॥ २ ॥ कानों- में सुन्दर कुण्डल हैं तथा सिरपर पत्र-पुष्प एवं लाल रङ्गकी मनोहर चौतनी टोपी है, उनका मुखचन्द्र करोड़ों कामदेवोंकी छबिका आश्रय है और उनके माथेपर मनोहर तिलक है ॥ ३ ॥ पुरजन और सम्पूर्ण राजसमाज आदरपूर्वक उनके अनूप रूपको निहार रहे हैं। इसी समय लक्ष्मणजी कहने लगे—'हे शेष, पृथ्वी एवं पर्वत- गण ! आज तुम निश्चल हो जाओ ॥ ४ ॥ हे कूर्म ! हे वाराह ! हे दिग्गजगण ! तुम सब अङ्गोंसे सावधान होकर प्रभुका कार्य निष्पन्न करो । इस समय महाराज दशरथके युवराज सहसा शिवजीका धनुष चढ़ाना चाहते हैं' ॥ ५ ॥ तब भगवान् रामने, मुनियोंको पुलकित करते हुए उस धनुषको हाथसे पकड़कर खेलहीमें उठा लिया और राजाओंके मुखोंके सहित उसे झुकाकर सभीको सुख दिया ॥ ६ ॥ फिर श्रीहरिने उसे सीताजीके हृदयसहित आकर्षित किया । इससे जनकजीका हृदय बड़ा प्रसन्न हुआ । इस प्रकार परशुरामजीके गर्वसहित उसे तोड़ डाला और तीनों लोकोंको मोह- हीन कर दिया ॥ ७ ॥ इससे प्रलयकालीन बादलोंके गर्जनके समान धनुषका बड़ा भारी कोलाहल हुआ । उससे शिव, ब्रह्मा और सकल दिक्पालगण चौंक पड़े तथा कान मूंदकर रह गये ॥ ८ ॥ फिर वे सावधान होकर विमानोंमें चढ़कर नगाड़े बजाते हुए चले । इससे

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