गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ बालकाण्ड सम्पूर्ण नगरमें आनन्द उमड़ चला तथा आकाश में जयध्वनि और मङ्गलगान होने लगा ॥ ९ ॥ तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञा सुन सुवासिनी सखियाँ जानकीजीको साथ लेकर चलीं। उस समय राजकुमारी जानकीजी दशरथनन्दन रामको देख उनके गलेमें जयमाल डाल सकुचाकर रह गयीं ॥ १० ॥ तब देवता और मुनिजन फूलोंकी वर्षा कर आशीर्वाद देने लगे। उनके हृदयमें प्रेम समाता नहीं था। श्रीसीता और रामजीकी उस सुन्दरतापर तुलसीदास बलिहारी है ॥ ११ ॥ राग मलार [ ९१ ] जब दोउ दसरथ-कुँवर बिलोके। जनक-नगर नर-नारि मुदित मन निरखि नयन पल रोके ॥ १ ॥ बय किसोर, घन-तड़ित-बरन तनु, नखसिख अंग लोभारे। द्वै चित, कै हित, लै सब छबि-बित बिधि निज हाथ सँवारे ॥ २ ॥ संकट नृपहि, सोच अति सीतहि, भूप सकुचि सिर नाए। उठे राम रघुकुल-कुल-केहरि, गुर-अनुसासन पाए ॥ ३ ॥ कौतुक ही कोदंड खंडि प्रभु, जय अरु जानकि पाई। तुलसिदास कीरति रघुपतिकी मुनिन्ह तिहूँ पुर गाई ॥ ४ ॥ जिस समय जनकपुरके नर-नारियोंने उन दोनों राजकुमारोंको देखा, उस समय उन्होंने उन्हें देखकर मनमें प्रसन्न हो अपने नेत्रोंकी पलकें गिराना रोक लिया अर्थात् एकटक दर्शन करने लगे ॥ १ ॥ उनकी किशोर अवस्था है, मेघ और विद्युत्के समान श्याम एवं गौर शरीर हैं तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग लुभानेवाले हैं,