भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

गीतावली १५० मानो विधाताने संसारके छविरूप धनको लेकर अपना चित्त और प्रेम लगाकर अपने हाथोंसे ही उनकी रचना की है ॥ २ ॥ (प्रतिज्ञा और प्रेमकी खींचातानीमें पड़कर) महाराज जनक बड़े संकटमें पड़े हुए हैं, सीताजीको अति संकोच हो रहा है और राजालोग [यह जानकर कि ये अवश्य धनुष तोड़ डालेंगे] संकोचवश सिर झुकाये हुए हैं, इसी समय गुंरुजीकी आज्ञा पा रघुकुलकेशरीप्रवर भगवान् राम उठे ॥ ३ ॥ प्रभुने खेलहीमें धनुषको तोड़कर जय और जानकी प्राप्त कर ली। तुलसीदासजी कहते हैं, रघुनाथजीकी उस कीर्तिकी मुनियोंने तीनों लोकोंमें गाया है ॥ ४ ॥ राग टोड़ी [ १२ ] मुनि-पदरेनु रघुनाथ माथे धरी है। रामरुख निरखि, लषनकी रजाइ पाइ, धरा धरा-धरनि सुसावधान करी है ॥ १ ॥ सुमिरि गनेस-गुर, गौरि-हर भूमिसुर, सोचत सकोचत सकोची बानि घरी है। दीनबंधु, कृपासिंधु, साहसिक, सीलसिंधु, सभाको सकोच कुलहूकी लाज परी है ॥ २ ॥ पेखि पुरुषारथ, परखि पन, पेम, नेम, सिय-हियकी बिसेषि बड़ी खरभरी है। दाहिनो दियो पिनाकु, सहमि भयो मनाकु, कहाब्याल बिकल बिलोकि जनु जरी है ॥ ३ ॥ सुर हरषत, बरषत फूल बार बार, सिद्ध-मुनि कहत, सगुन, सुभ घरी है।