गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५१ बालकाण्ड रामबाहु-बिटप बिसाल बोंड़ी देखियत, जनक-मनोरथ कलपबेलि फरी है॥ ४॥ लख्यौ न चढ़ावत, न तानत, न तोरत हू घोर धुनि सुनि सिवकी समाधि टरी है। प्रभुके चरित चारु तुलसी सुनत सुख, एक ही सुलाभ सबहीकी हानि हरी है॥ ५॥ रघुनाथजीने मुनिके चरणकमलोंकी रज मस्तकपर धारण की तथा रामचन्द्रजीका रुख देख और लक्ष्मणजीकी आज्ञा पा पृथ्वीने अपने धारण करनेवाले [शेष, कूर्म, वराह आदि] को सावधान कर दिया ॥ १ ॥ जानकीजी गणेश, गुरु शतानन्द, पार्वती, शङ्कर और ब्राह्मणोंका स्मरण कर सोच एवं संकोच करने लगीं, संकोचमय स्वभाव-धारणकी उनकी बान ही है। [फिर वे श्रीरघुनाथजीसे भी मन-ही-मन कहने लगीं कि] आप तो दीनबन्धु, कृपासागर, साहसी और शीलसमुद्र हैं। इस समय [धनुष और पिताके प्रणकी दृढ़ता देखकर] मुझे सभाका संकोच हो रहा है तथा कुलकी लज्जा भी है ही ॥ २ ॥ उस समय राजाओंके पुरुषार्थ, जनकजीके प्रण तथा विशेषकर अपने प्रति सीताजीके प्रेम और ऐसे नियमको देखकर कि [मेरी शरण लेनेपर भी] उनके हृदयमें बड़ी खलबली पड़ी हुई है, भगवान्ने धनुषको दाहिना दिया (प्रदक्षिणाकी)। ऐसा करते ही वह धनुष सहमकर अत्यन्त लघु हो गया, जैसे किसी जड़ीको देखकर महासर्प व्याकुलतापूर्वक (सिकुड़कर) छोटा हो जाता है ॥ ३ ॥ [ऐसा प्रभाव देखकर] देवतालोग प्रसन्न हो गये और बार-बार फूलोंकी वर्षा करने लगे। सिद्ध और मुनिजन कहते हैं कि