भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

गीतावली १५२ यह घड़ी बड़ी शुभ है और सगुन भी बड़े अच्छे हैं। रामचन्द्रजीके विशाल भुजारूप सुन्दर वृक्षपर छायी हुई, मानो जनकजीकी मनोरथ- रूप कल्पलता फल आयी है ॥ ४ ॥ उस धनुषको चढ़ाते, तानते और तोड़ते हुए भगवान्‌को कोई न देख सका। उसकी ध्वनिको सुनकर शिवजीकी भी समाधि टूट गयी। तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये मनोहर चरित्र सुनकर सबको आनन्द प्राप्त हुआ और इस एक ही सुन्दर लाभसे एक साथ सभीकी हानियाँ दूर हो गयीं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९३ ] राम कामरिपु-चाप चढ़ायो। मुनिहि पुलक, आनंद नगर, नभ निरखि निसान बजायो ॥ १ ॥ जेहि पिनाक बिनु नाक किए नृप, सबहि बिषाद बढ़ायो। सोइ प्रभु कर परसत टूट्यो, जनु हुतो पुरारि पढ़ायो ॥ २ ॥ पहिराई जयमाल जानकी, जुवतिन्ह मंगल गायो। तुलसी सुमन बरषि हरषे सुर, सुजस तिहू पुर छायो ॥ ३ ॥ जिस समय रघुनाथजीने शङ्करका धनुष चढ़ाया उस समय मुनिवरको पुलकावली हो आयी, नगरमें आनन्द छा गया तथा देवतालोग देखकर आकाशमें बाजे बजाने लगे ॥ १ ॥ जिस धनुषने सभी राजाओंको बिना नाकका कर दिया था (अपमानित कर रक्खा था) और सभीका विषाद बढ़ाया था, वही प्रभुके हाथका स्पर्श होते ही टूट गया, मानो उसे महादेवजीने ऐसा ही पढ़ा रक्खा था ॥ २ ॥ तदनन्तर जानकीजीने जयमाला पहनायी तथा युवतियोंने मङ्गलगांन किया। तुलसीदास कहते हैं, सभी देवगण पुष्पोंकी वर्षा कर हर्षित हो गये और भगवान्‌का सुयश तीनों लोकोंमें छा गया ॥ ३ ॥