गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १२ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या जबहि रघुपति सँग सीय चली १८२ तुम्हरे बिरह भई गति जोन.... ३१५ जबतें सिधारे यहि मारग .... २१५ तू देखि देखि री ! पथिक १८७ जननी निरखति बान .... २३३ तू दस कंठ भले कुल जायो .. ३५४ जब-जब भवन बिलोकति सूनो २३५ तें मेरो मरम कछू .... ३५५ जबतें चित्रकूट तें आए .... २५८ तौलौं, मातु ! आपु ३०८ जबहि सिय सुधि सब .... २७८ तौलौं बलि, आपुही .... ४३३ जब रघुबीर पयानो कीन्हों .... ३१७ दीन हित बिरद ३४३ जबतें जानकी रही .... ४३७ दूलह राम, सीय दुलही री ! १६७ जागिये कृपानिधान .... ८० दूर रो न देखतु .... ३२२ जानकी बर सुंदर, माई .... १६६ देखि मुनि ! रावरे पद आज ६२ जानत हौं सबहीके मनकी .... २५१ देखि देखि री! दोउ राजसुवन १३३ जानी है संकर-हनुमान .... २६० देखु, कोक परमसुंदर .. १६६ जाय माय पाँय परि .... ३२३ देखि ! द्वै पथिक गोरे साँवरे १६८ जेहि जेहि मग सिय-राम-लषन २०५ देखु री सखी ! पथिक . २०२ जैसे राम ललित .... ८५ देखत चित्रकूट-बन २२४ जैसे ललित लषन लाल लोने १६८ देखे राम-पथिक नाचत २६७ जो पै हौं मातु मते महं हौं २४३ देखी जानकी जब जाइ .... २६२ जो हौं प्रभु-आयसु लै चलतो ३०७ देखु सखि ! आजु .. ३८८ जो हौं अब अनुसासन पावौं २६१ देखो, राघव-बदन .... ३६८ झूलत राम पालने सोहैं .. ६० देखो रघुपति-छवि ४०८ ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे १८२ देखत अवधको आनन्द .. ४२७ ताते हौं देत न दूषन तोहू .... २४२ दोउ राजसुवन राजत ६६ ता दिन सृंगबेरपुर आए .... २४८ नाहिन भजिबे जोग बियो ... ३४५ तात ! बिचारोधों, हौं क्योंआवौं २५२ नीके कै मैं न विलोकन पाये २०६ तात तोहूसों कहत .... २६६ नीके कै जानत राम हियो हौं २८१