भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

गीतावली १५४ कुलहि लजावैं बाल, बालिस बजावैं गाल, कैधौं क्रूर कालबस, तमकि त्रिदोषे हैं ॥ २ ॥ कुँवर चढ़ाइँ भौंहैं, अब को बिलोकैं सोहैं, जहँ तहँ भे अचेत, खेतके-से धोखे हैं। देखे नर-नारि कहैं, साग खाइ जाए माइ; बाहु पीन पाँवरनि पीना खाइ पोखे हैं ॥ ३ ॥ प्रमुदित-मन लोक-कोक-नद कोकगन, रामके प्रताप-रबि सोच-सर सोखे हैं। तबके देखैया तोषे, तबके लोगनि भले, अबके सुनैया साधु तुलसिहु तोषे हैं ॥ ४ ॥ निकम्मे राजा लज्जा त्याग कर युद्धका साज सजा रणके लिये रोषमें भर गये और कहने लगे—‘अरे ! धनुष चढ़ा लेनेसे ही क्या होता है, अभी विवाह तो बहुत कुछ खानेपर (बड़ी कठिनाईसे) होगा !’ ऐसा कहकर वे भाले निकालते हैं और तलवारोंको खूब चमकाते हैं ॥ १ ॥ यह जानकर पुरवासी तो भयभीत हो गये, किन्तु लक्ष्मणजी उन्हें धैर्य बंधाकर हँसने लगे और बोले—‘अरे ! इनका बल तो इस धनुषने अच्छी तरह जाँच लिया है। ये मूर्ख अपने कुलको लजाते और व्यर्थ गाल बजाते हैं अथवा क्रूर कालके वशीभूत हो तमककर—त्रिदोषमें पड़कर बकवाद कर रहे हैं?’ ॥ २ ॥ ऐसा कह राजकुमार लक्ष्मणने भौंहें चढ़ा लीं। अब उनको सामनेसे कौन देख सकता था ? खेतके धोखोंके* समान सब जहाँ-तहाँ अचेत हो गये। उन्हें देखकर नगरके स्त्री-पुरुष कहने *जो मनुष्यका-सा आकार बनाकर खेतोंमें मृग एवं पक्षियोंको डरानेके लिये खड़े कर दिये जाते हैं।