गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५५ बालकाण्ड लगे 'इनकी माताओंने शाक खाकर इन्हें जना है और इन पामरोंकी मोटी-मोटी भुजाएँ भी खली खा-खाकर ही पुष्ट हुई हैं' ॥ ३ ॥ इस प्रकार रामके प्रतापरूप सूर्यके उदित होते ही सम्पूर्ण लोकरूप कमल एवं चकवा-चकवी प्रसन्नचित्त हो गये तथा शोकरूप सरोवर सूख गये । उस समयके ये सब चरित्र देखनेवाले भले लोग सन्तुष्ट हुए तथा इस समय ये सब बातें सुननेवाले साधुजन एवं तुलसीदास भी सन्तुष्ट हुए हैं ॥ ४ ॥ [ ९६ ] जयमाल जानकी जलजकर लई है। सुमन सुमंगल सगुनकी बनाइ मंजु, मानहु मदनमाली आपु निरमई है ॥ १ ॥ राज-रुख लखि गुर भूसुर सुआसिनिन्हि, समय-समाजकी ठवनि भली ठई है। चलीं गान करत, निसान बाजे गहगहे, लहलहे लोयन सनेह सरसई है ॥ २ ॥ हनि देव दुंदुभी हरषि बरषत फूल, सफल मनोरथ भौ, सुख-सुचितई है। पुरजन-परिजन, रानी-राउ प्रमुदित, मनसा अनूप राम-रूप-रंग रई है ॥ ३ ॥ सतानंद-सिष सुनि पाँय परि पहिराई, माल सिय पिय-हिय, सोहत सो भई है। मानसतें निकसि बिसाल सुतमालपर, मानहुँ मरालपाँति बैठी बनि गई हैं ॥ ४ ॥