भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली १५६ हितनिके लाहकी, उछाहकी, बिनोद-मोद, सोभाकी अवधि नहिं अब अधिकई है। याते बिपरीत अनहितनकी जानि लीबी गति, कहे प्रगट, खुनिस खासी खई है॥ ५ ॥ निज निज बेदकी सप्रेम जोग-छैम-मई, मुदित असीस बिप्र बिदुषनि दई है। छबि तेहि कालकी कृपालु सीतादूलहकी हुलसति हिये तुलसीके नित नई है॥ ६ ॥ जानकीजीने अपने करकमलमें जयमाल ली है, जिस मनोहर मालाका—मानो मंगलमय पुष्प और सुन्दर डोरीसे गूंथकर कामदेव- रूप मालीने स्वयं ही निर्माण किया है ॥ १ ॥ राजाका रुख जान गुरु शतानन्दजी, ब्राह्मणलोग और सुवासिनी स्त्रियोंने समय और समाजके अनुरूप सुन्दर साज सजा. [सीताजीको आगे कर] सब सखियाँ मङ्गलगान करती हुई चलीं। उस समय उत्साह बढ़ानेवाले बाजे बजने लगे तथा श्रीराम और सीताके पारस्परिक दर्शनके लिये उतावले हुए नेत्रोंमें स्नेह सरसाने लगा ॥ २ ॥ देवतालोग दुन्दुभी बजाकर प्रसन्नतासे फूल बरसाने लगे। अपना मनोरथ सफल हो जानेसे उन्हें बड़े सुख और शान्तिका अनुभव हो रहा है। पुरवासी, परिजन तथा रानी और राजा अति आनन्दित हैं और मन-ही-मन रामके अनूप रूप-रङ्गमें रँग गये हैं ॥ ३ ॥ फिर गुरु शतानन्दजीकी शिक्षा सुन सीताजीने पैरों पड़कर अपने प्रियतमके गलेमें माला पहना दी। वह ऐसी शोभायमान हो रही है, मानो हंसोंकी पंक्ति मानसरोवरसे निकलकर किसी सुन्दर तमालवृक्षपर बैठकर सज रही हो ॥ ४ ॥ भगवान्‌के प्रेमियोंके लिये तो इससे