गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिक लाभ, उत्साह, मोद, विनोद और शोभाकी अवधि और कोई है ही नहीं। किन्तु प्रभुसे द्वेष करनेवालोंकी गति इससे विपरीत समझनी चाहिये। प्रकटरूपमें यह कह सकते हैं कि उन्हें तो मानो क्रोध और ईर्ष्याने भलीभाँति ग्रस लिया है ॥ ५ ॥ तब विद्वान् ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक अपने-अपने वेदोंका योग-क्षेममय आशीर्वाद दिया। दयामय सीतापतिकी उस समयकी छबि तुलसी- दासके हृदयमें नित्य नयी होकर हुलस रही है ॥ ६ ॥ राग केदारा [ ९७ ] लेहु री लोचननिको लाहु। कुँवर सुंदर साँवरो, सखि सुमुखि ! सादर चाहु ॥ १ ॥ खंडि हर-कोदंड ठाढ़े, जानु-लंबित-बाहु। रुचिर उर जयमाल राजति, देत सुख सब काहु ॥ २ ॥ चित चित हित-सहित नखसिख अंग-अंग निबाहु। सुकृत निज, सियराम-रूप, बिरंचि-मतिहि सराहु ॥ ३ ॥ मुदित मन बरबदन-सोभा उदित अधिक उछाहू। मनहु दूरि कलंक करि ससि समर सूझो राहू ॥ ४ ॥ नयन सुखमा-अयन हरत सरोज-सुंदरताहु। बसत तुलसीदास-उरपुर जानकीकौ नाहु ॥ ५ ॥ अरी सुमुखि सखि ! तनिक नेत्रोंका लाभ तो ले। साँवले कुँवर बड़े ही सुन्दर हैं, इन्हें तनिक आदरपूर्वक देख ले ॥ १ ॥ देख; ये महादेवजीका धनुष तोड़कर जानुपर्यन्त बाहु लटकाये खड़े हैं। इनके गलेमें मनोहर जयमाल सुशोभित है, जो सभीको आनन्द