गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
अधिक लाभ, उत्साह, मोद, विनोद और शोभाकी अवधि और कोई है ही नहीं। किन्तु प्रभुसे द्वेष करनेवालोंकी गति इससे विपरीत समझनी चाहिये। प्रकटरूपमें यह कह सकते हैं कि उन्हें तो मानो क्रोध और ईर्ष्याने भलीभाँति ग्रस लिया है ॥ ५ ॥ तब विद्वान् ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर प्रेमपूर्वक अपने-अपने वेदोंका योग-क्षेममय आशीर्वाद दिया। दयामय सीतापतिकी उस समयकी छबि तुलसी- दासके हृदयमें नित्य नयी होकर हुलस रही है ॥ ६ ॥ राग केदारा [ ९७ ] लेहु री लोचननिको लाहु। कुँवर सुंदर साँवरो, सखि सुमुखि ! सादर चाहु ॥ १ ॥ खंडि हर-कोदंड ठाढ़े, जानु-लंबित-बाहु। रुचिर उर जयमाल राजति, देत सुख सब काहु ॥ २ ॥ चित चित हित-सहित नखसिख अंग-अंग निबाहु। सुकृत निज, सियराम-रूप, बिरंचि-मतिहि सराहु ॥ ३ ॥ मुदित मन बरबदन-सोभा उदित अधिक उछाहू। मनहु दूरि कलंक करि ससि समर सूझो राहू ॥ ४ ॥ नयन सुखमा-अयन हरत सरोज-सुंदरताहु। बसत तुलसीदास-उरपुर जानकीकौ नाहु ॥ ५ ॥ अरी सुमुखि सखि ! तनिक नेत्रोंका लाभ तो ले। साँवले कुँवर बड़े ही सुन्दर हैं, इन्हें तनिक आदरपूर्वक देख ले ॥ १ ॥ देख; ये महादेवजीका धनुष तोड़कर जानुपर्यन्त बाहु लटकाये खड़े हैं। इनके गलेमें मनोहर जयमाल सुशोभित है, जो सभीको आनन्द
गीतावली १५८ देती है ॥ २ ॥ इन्हें हार्दिक प्रेमसहित देख । नखसे शिखापर्यन्त इनका प्रत्येक अङ्ग यथायोग्य रूपसे सुशोभित है । इन्हें देखकर अपने पुण्य, सीतारामके रूप तथा [इन मूर्तियोंको रचनेवाले] विधाताकी बुद्धिकी सराहना कर ॥ ३ ॥ प्रसन्न मनके कारण सुन्दर मुखमण्डलकी शोभापर और भी अधिक उत्साह उदित हो रहा है, मानो चन्द्रमाने अपना कलङ्क दूर कर युद्धमें राहुको मार डाला हो ॥ ४ ॥ इनके सुषमासदन नयन कमलकी भी सुन्दरताको हर लेते हैं । ऐसे ये जानकीपति तुलसीदासके हृदयरूप पुरमें विराजते हैं ॥ ५ ॥ राग सारङ्ग [ ९८ ] भूपके भागकी अधिकाई । टूट्यौ धनुष, मनोरथ पूज्यौ, बिधि सब बात बनाई ॥ १ ॥ तबतें दिन-दिन उदय जनकको जबतें जानकी जाई । अब यहि ब्याह सफल भयो जीवन, त्रिभुवन बिदित बड़ाई ॥ २ ॥ बारहि बार पहुनई ऐहैं राम लषन दोउ भाई । एहि आनंद मगन पुरबासिन्ह देहदसा बिसराई ॥ ३ ॥ सादर सकल बिलोकत रामहि, काम-कोटि छबि छाई । यह सुख समउ समाज एक मुख क्यों तुलसी कहै गाई ॥ ४ ॥ [कोई सखी कहती है—] 'यह महाराज जनकके भाग्यकी अधिकता ही है कि धनुष टूट गया, मनोरथ पूर्ण हो गया और विधाताने सारी बात बना दी ॥ १ ॥ जबसे जानकीका जन्म हुआ है तबसे जनकजीकी दिनोंदिन उन्नति हो रही है । अब इसका
१५६ बालकाण्ड विवाह करके तो इनका जीवन ही सफल हो गया है। इस समय तीनों लोकोंमें इनकी बड़ाई प्रकट हो गयी है ॥ २ ॥ अहा ! अब ये राम-लक्ष्मण दोनों भाई बारम्बार पाहुने होकर आया करेंगे।' इस प्रकार आनन्दमें मग्न होकर पुरवासियोंने अपने देहकी सुधि भुला दी ॥ ३ ॥ सब लोग आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको देख रहे हैं, जिनपर करोड़ों कामदेवोंकी छवि छायी हुई है। उस सुख, समय और समाजका तुलसीदास एक ही मुखसे कैसे बखान कर सकता है ? ॥ ४ ॥ विवाहकी तैयारी राग सोरठ [ ९९ ] मेरे बालक कैसे धौं मग निबहहिंगे ? भूख, पियास, सीत, श्रम सकुचनि क्यों कौसिकहि कहहिंगे ॥ १ ॥ को भोर ही उबटि अन्हवैहै, काढ़ि कलेऊ दैहै ? को भूषन पहिराइ, निछावरि करि लोचन-सुख लैहै ? ॥ २ ॥ नयन निमेषनि ज्यों जोगवैं नित पितु-परिजन-महतारी । ते पठए ऋषि साथ निसाचर मारन, मख रखवारी ॥ ३ ॥ सुंदर सुठि सुकुमार सुकोमल, काकपच्छ-धर दोऊ । तुलसी निरखि हरषि उर लैहौं बिधि ह्वै है दिन सोऊ ? ॥ ४ ॥ [ इधर कौसल्याजी चिन्ता कर रही हैं— ] 'मेरे बालक किस प्रकार मार्गमें निर्वाह करेंगे ? वे संकोचवश अपनी भूख, प्यास, शीत और श्रम आदिके विषयमें विश्वामित्रजीसे भी क्यों कहेंगे ? ॥ १ ॥ उन्हें प्रातःकाल होते ही उबटन मलकर कौन स्नान करावेगा, कौन
गीतावली १६० कलेवा निकाल कर देगा और कौन आभूषण पहनाकर निछावर करते हुए नेत्रोंका आनन्द लूटेगा ! ॥ २ ॥ जिन्हें पिता, परिजन और माताएँ सर्वदा नेत्रोंकी पलकोंके समान सँभाल रखती थीं, उन्हें राजाने यज्ञकी रखवाली और निशाचरोंका संहार करनेके लिये विश्वामित्रजीके साथ भेज दिया ! ॥ ३ ॥ हे विधाता ! क्या कभी वह दिन आवेगा जब मैं उन अति सुन्दर, सलोने, सुकुमार, सुकोमल और काकपक्षधारी दोनों बालकोंको देखकर हर्षित हो हृदयसे लगाऊँगी ?' ॥ ४ ॥ [ १०० ] ऋषि नृप-सीस ठगौरी-सी डारी । कुलगुर, सचिव, निपुन नेवनि अवरेब न समुझि सुधारी ॥ १ ॥ सिरिस-सुमन-सुकुमार कुँवर दोउ, सूर सरोष सुरारी । पठए बिनहि सहाय पयादेहि केलि-बान-धनुधारी ॥ २ ॥ अति सनेह-कातरि माता कहै, सुनि सखि ! बचन दुखारी । बादि बीर-जननी-जीवन जग, छत्रि-जाति-गति भारी ॥ ३ ॥ जो कहिहै फिरे राम-लषन घर करि मुनिमख-रखवारी । सो तुलसी प्रिय मोहिं लागिहै ज्यौं सुभाय सुत चारी ॥ ४ ॥ 'ऋषिवर विश्वामित्रजीने तो राजाके मस्तकपर कुछ जादू-सा कर दिया । इस विपरीत स्थितिका कुलगुरु, मन्त्री और निपुण नायकोंने भी बुद्धिपूर्वक सुधार नहीं किया ! ॥ १ ॥ देखो, दोनों कुमार तो सिरसके फूलके समान सुकुमार हैं और राक्षसलोग बड़े शूरवीर तथा क्रोधी हैं । फिर भी क्रीडाके धनुष-बाण लिये उन्हें बिना किसी प्रकारकी सहायताके पैदल ही भेज दिया' ॥ २ ॥
१६१ बालकाण्ड इस प्रकार माता कौसल्या स्नेहसे आतुर और दुःखित होकर कहने लगीं—"अरी सखि ! सुन, संसारमें वीर पुरुषकी माताका जीवन तो वृथा ही है और क्षत्रिय-जातिकी गति भी बड़ी ही विकट है ॥ ३ ॥ जो पुरुष मुझसे यह कहेगा कि 'राम और लक्ष्मण मुनिके यज्ञकी रक्षा कर घर लौट आये हैं' वह स्वभावसे ही मुझे वैसा ही प्रिय लगेगा जैसे चारों पुत्र" ॥ ४ ॥ [ १०१ ] जबतें लै मुनि संग सिधाए। राम लखनके समाचार, सखि ! तबतें कछूअ न पाए ॥ १ ॥ बिनु पानही गमन, फल भोजन, भूमि सयन तरुछाहीं। सर-सरिता जलपान, सिसुनके संग सुसेवक नाहीं ॥ २ ॥ कौसिक परम कृपालु, परमहित समरथ, सुखद, सुचाली। बालक सुठि सुकुमार सकोची, समुझि सोच मोहि आलीं ॥ ३ ॥ बचन सप्रेम सुमित्राके सुनि सब सनेह-बस रानी। तुलसी आइ भरत तेहि औसर कही सुमंगल बानी ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! जबसे मुनीश्वर अपने साथ लेकर गये हैं तबसे मुझे राम-लक्ष्मणका कुछ भी समाचार नहीं मिला ॥ १ ॥ उन्हें बिना जूतियोंके चलना, फलाहार करना, वृक्षकी छायामें पृथ्वीपर सोना और नदी एवं तालाबोंका जल पीना पड़ेगा । उन बालकोंके साथ कोई अच्छा सेवक भी नहीं है ॥ २ ॥ विश्वामित्रजी तो बड़े कृपालु, परमहितकारी, सामर्थ्यवान्, सुखदायक और सदाचारी हैं, परन्तु ये शुद्धचित्त बालक भी बड़े ही सुकुमार और संकोच करनेवाले हैं—अरी आली ! यह जानकर ही मुझे बड़ा सोच हो रहा गी० ११—
गीतावली १६२ हैं' ॥ ३ ॥ सुमित्राके ये प्रेमपूर्ण वचन सुनकर सब रानियाँ स्नेहवश हो गयीं। तुलसीदास कहते हैं, इसी समय भरतजीने आकर मङ्गलमय वचन सुनाये ॥ ४ ॥ [ १०२ ] सानुज भरत भवन उठि धाए। पितु-समीप सब समाचार सुनि, मुदित मातु पहँ आए ॥ १ ॥ सजल नयन, तनु पुलक, अधर फरकन लखि प्रीति सुहाई । कौसल्या लिये लाइ हृदय, ‘बलि कहौ, कछु है सुधि पाई ?॥ २ ॥ सतानंद उपरोहित अपने तिरहुति-नाथ पठाए। खेम कुसल रघुबीर-लषनकी ललित पत्रिका ल्याए ॥ ३ ॥ दलि ताड़का, मारि निसिचर, मख राखि, बिप्र-तिय तारी। दै बिद्या लै गये जनकपुर, हैं गुरु-संग सुखारी ॥ ४ ॥ करि पिनाक पन, सुता स्वयंबर सजि, नृप कटक बटोरयो। राजसभा रघुबीर मृनाल ज्यों संभु सरासन तोरयो ॥ ५ ॥ यों कहि सिथिल सनेह बंधु दोउ, अंब अंक भरि लीन्हें। बार बार मुख चूमि, चारु मनि-बसन निछावरि कीन्हें ॥ ६ ॥ सुनत सुहावनि चाह अवध घर घर आनंद बधाई। तुलसिदास रनिवास रहस-बस सखी सुमंगल गाई ॥ ७ ॥ भाई शत्रुघ्नके सहित भरतजी उठकर राजभवनको दौड़ आये। वे पिताजीके पास सारे समाचार सुन, प्रसन्न
१६३ बालकाण्ड कहो कुछ समाचार मिला क्या ?' ॥ २ ॥ [ भरतजीने कहा— ] 'माता ! तिरहुतराज जनकजाने अपने पुरोहित शतानन्दजीको भेजा है; वे राम-लक्ष्मणके कुशल-क्षेमकी सुन्दर पत्रिका लाये हैं ॥ ३ ॥ उन्होंने ताड़काका दमन और राक्षसोंका संहार कर विश्वामित्रजीके यज्ञकी रक्षा की और फिर मुनिपत्नी (अहल्या) का उद्धार किया। तदनन्तर विश्वामित्रजी उन्हें विद्या पढ़ाकर जनकपुर ले गये; वहाँ वे गुरुजीके साथ आनन्दपूर्वक हैं ॥ ४ ॥ जनकजीने पिनाक ( चढ़ाने ) का प्रण करके, अपनी पुत्रीके स्वयंवरका साज सजाकर बहुत-से राजाओंको एकत्र किया था। उस राजसभामें रघुनाथजीने वह धनुष कमलनालके समान तोड़ डाला' ॥ ५ ॥ ऐसा कहकर दोनों भाई स्नेहसे शिथिल हो गये। तब माताने उन्हें गोदमें उठा लिया और बारम्बार मुख चूमकर मनोहर मणि और वस्त्रादि निछावर किये ॥ ६ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इस सुहावनी मनोकामनाका समाचार सुनते ही अयोध्यामें घर-घर आनन्दमयी बधाई बजने लगी और रनिवासमें भी सखियोंने आनन्दवश मङ्गलगान आरम्भ कर दिया ॥ ७ ॥ राग कान्हरा [ १०३ ] राम-लषन सुधि आई, बाजै अवध बाधई । ललित लगन लिखि पत्रिका, उपरोहितके कर जनक-जनेस पठाई ॥ १ ॥ कन्या भूप बिदेहकी रूपकी अधिकाई, तासु स्वयंबर सुनि सब आई देस देसके नृप चतुरंग बनाई ॥ २ ॥
गीतावली १.६४ पन पिनाक, पबि मेरु तें गुरुता कठिनाई । लोकपाल, महिपाल, बान बानइत, दसानन सके न चाप चढ़ाई ॥ ३ ॥ तेहि समाज रघुराजके मृगराज जगाई । भंजि सरासन संभुको जग जय, कल कीरति, तिय तियमनि सिय पाई ॥ ४ ॥ पुर घर घर श्रानंद महा सुनि चाह सुहाई । मातु मुदित मंगल सजें, कहैं मुनि प्रसाद भये सकल सुमंगल, माई ॥ ५ ॥ गुरु-आयसु मंडप रच्यो, सब साज सजाई । तुलसिदास दसरथ बरात सजि, पूजि गनेसहि चले निसान बजाई ॥ ६ ॥ [अयोध्यावासी नर-नारी आपसमें कहने लगे—] 'आज राम-लक्ष्मणका समाचार मिला है, इसीसे अयोध्यामें बधाई बज रही है। महाराज जनकने सुन्दर लग्नपत्रिका लिखकर अपने पुरोहितके हाथ भेजी है ॥ १ ॥ महाराज विदेहके रूपमें बढ़ी-चढ़ी एक कन्या है। उसके स्वयंवरका समाचार सुन देश-देशान्तरके नृपतिगण अपनी-अपनी चतुरङ्गिणी सेनाएँ सजाकर आये थे ॥ २ ॥ उस स्वयंवरका प्रण महादेवजीका धनुष था, जिसकी गुरुता और कठोरता वज्र एवं मेरुसे अधिक थी । उस धनुषको लोकपाल, अन्य महिपाल तथा धनुर्विद्यामें निपुण बाणासुर एवं रावणादि भी नहीं चढ़ा सके ॥ ३ ॥ उस समाजमें [महाराज जनकने कुछ कटु वचन कहकर] रामरूप मृगराज (सिंह) को जगा दिया । उन्होंने महादेवजीका धनुष तोड़कर संसारमें विजय, कमनीय कीर्ति और
१६५ बालकाण्ड पत्नीरूपसे स्त्रीरत्न सीताको प्राप्त किया' ॥ ४ ॥ यह सुहावना समाचार सुनकर नगरमें घर-घर परम आनन्द हो रहा है। माताएँ प्रसन्न होकर मङ्गलके साज सजाती हैं और कहती हैं—'माई ! मुनीश्वरकी कृपासे ही ये सारे सुमङ्गल हुए हैं, ॥ ५ ॥ फिर गुरुजीकी आज्ञा पा, सब प्रकारकी सामग्रियोंसे सजाकर मण्डप रचा गया। तुलसीदासजी कहते हैं—इस प्रकार महाराज दशरथ बरात सजाकर गणेशजीका पूजनकर निसान बजाते हुए चले ॥ ६ ॥ राग केदारा [ १०४ ] मनमें मंजु मनोरथ हो, री ! सोहर-गौरि-प्रसाद एकतें, कौसिक, कृपा चौगुनो भो, री ! ॥ १ ॥ पन-परिताप, चाप-चिंता-निसि, सोच-सकोच-तिमिर नहिं थोरी। रबिकुल-रबि अवलोकि सभा-सर हितचित-बारिज-बन बिकसोरी ॥ २ ॥ कुँवर-कुँवरि सब मंगल मूरति, नृप दोउ धरमधुरंधर-धोरी। राजसमाज भूरिभागी, जिन लोचन लाहु लह्यो एक ठौरी ॥ ३ ॥ ब्याह-उछाह राम-सीताको सुकृत सकेलि बिरंचि रच्यो, री। तुलसिदास जानै सोइ यह सुख, जेहि उर बसति मनोहर जोरी ॥ ३ ॥ [बरात देखकर जनकपुरकी स्त्रियाँ कहने लगीं—] अरी सखि ! हमारे मनमें जो एक मनोहर मनोरथ था वह श्रीशङ्कर और पार्वतीजीके प्रसादसे तथा विश्वामित्रजीकी कृपासे चौगुना हो गया ॥ १ ॥ प्रणके पश्चात्ताप और चापरूप चिन्ताकी रात्रिमें [ धनुष न टूटनेका ] सोच और [ प्रण छोड़नेका ] संकोचरूप अन्धकार कुछ कम नहीं था; किन्तु सूर्यकुलके सूर्य श्रीरामचन्द्रको
गीतावली १६६ देखते ही इस राजसभारूप सरोवरमें सुहृज्जनोंके चित्तरूप कमलोंका वन विकसित हो गया है॥२॥ राम आदि राजकुमार और जानकी आदि कुमारियाँ ये सभी मङ्गलकी मूर्ति हैं और दोनों महाराज भी धर्मधुरन्धरोंमें धुरीण हैं। यह राज-समाज भी बड़भागी है, जिसने नेत्रोंका यह लाभ एक ही स्थानपर प्राप्त कर लिया ॥ ३॥ राम सीताके विवाहका यह उत्साह विधाताने सारे सुकृतोंको एकत्र करके रचा है। तुलसीदासजी कहते हैं, इस सुखको वही जान सकता है जिसके हृदयमें यह मनोहर जोड़ी विराजमान रही है॥४॥ [ १०५ ] राजति राम-जानकी-जोरी। स्याम-सरोज जलद सुंदर बर, दुलहिनि तड़ित-बरन तनु गोरी ॥ १ ॥ ब्याह समय सोहति बितानतर, उपमा कहुँ न लहति मति मोरी। मनहुँ मदन मंजुल मंडपमहँ छबि-सिंगार-सोभा इक ठौरी ॥ २॥ मंगलमय दोउ, अंग मनोहर, ग्रथित चूनरी पीत पिछोरी। कनककलस कहँ देत भाँवरी, निरखि रूप सारद भइ भोरी ॥ ३ ॥ इत बसिष्ठ मुनि, उतहि सतानँद, बंस बखान करें दोउ ओरी। इत अवधेस, उतहि मिथिलापति, भरत अंक सुख सिंधु हिलोरी ॥ ४ ॥ मुदित जनक, रनिवास रहसबस, चतुर नारि चितवहिं तृन तोरी। गान-निसान बेद धुनि सुनि सुर बरसत सुमन, हरष कहै कोरी ॥ ५॥ नयननको फल पाइ प्रेमबस सकल असीसत ईस निहोरी। तुलसी जेहि आनंदमगन मन, क्यों रसना बरनै सुख सोरी ॥ ६ ॥ राम और जानकीकी जोड़ी विराजमान है। वर नीलकमल एवं श्याममेघके समान सुन्दर है तथा दुलहिन बिजलीके समान गोरे
१६७ बालकाण्ड शरीरकी है ॥ १ ॥ विवाहके समय वे मण्डपके नीचे शोभायमान हैं। इस समय मेरी बुद्धिको कहींपर उनकी उपमा नहीं मिलती, मानो कामदेवके मण्डपमें छबि और शृङ्गाररसकी शोभा ही एकत्र हो गयी हो ॥ २ ॥ दोनों ही परम मङ्गलमय और मनोहर अङ्गोंवाले हैं तथा चूनरी और पीताम्बरके ग्रन्थि बन्धनके सहित सुवर्णमय कलशकी भाँवरी दे रहे हैं। उस रूपमाधुरीको देखकर शारदाकी बुद्धि भी चकरा गयी ॥ ३ ॥ इधर वसिष्ठजी और उधर मुनिवर शतानन्द—ये दोनों ओरसे शाखोच्चार कर रहे हैं। इधर अयोध्या- पति दशरथजी और उधर मिथिलाधिपति जनक आनन्दसिन्धु हिलोरकर अपनी गोदमें भर रहे हैं ॥ ४ ॥ इस समय जनकजी परम प्रसन्न हैं, रनिवास स्नेहविवश हो रहा है तथा चतुर नारियाँ (नजर न लग जाय, इसलिये) तिनका तोड़कर निहार रही हैं उस समय गान, निसान और वेदोंकी ध्वनि सुनकर देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं। उस हर्षका भला कौन बखान कर सकता है ! ॥ ५ ॥ इस प्रकार नेत्रोंका फल पाकर सब नर-नारी प्रेमवश श्रीमहादेवजी का निहोरा देकर आशीर्वाद देते हैं। तुलसीदास कहते हैं, जिस सुखमें मन भी आनन्दमें डूब जाता है उसका जिह्वा भला कैसे वर्णन कर सकती है ! ॥ ६ ॥ [ १०६ ] दूलह राम, सीय दुलही री ! घन-दामिनि बर बरन, हरन-मन सुंदरता नखसिखनि बही, री ॥ १ ॥ ब्याह-बिभूषन-बसन-बिभूषित, सखिअवली लखि ठगि सी रही, री। जीवन-जनम-लाहु, लोचन फल है इतनोइ, लह्यो आजु सबँही, री ॥ २ ॥
गीतावली १६८ सुखमा सुरभि सिगार-छीर दुहि मयन अमियमय कियो है दही, री। मथि माखन सिय-राम सँवारे, सकल भुवन छबि मनहु मरी, री ॥ ३ ॥ तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा अतुल, न जाति कही, री। रूप-रासि बिरची बिरंचि मनो, सिला लवनि रति-काम लही री ॥ ४ ॥ राम दूलह हैं और सीता दुलहिन हैं। दोनोंका मेघ और बिजलीके समान सुन्दर वर्ण है तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त मनको चुरानेवाली सुन्दरता छायी हुई है ॥ १ ॥ इन्हें विवाहके वस्त्रा- भूषणोंसे अलंकृत देख सारा सखीसमाज ठगा-सा रह गया है। वास्तवमें जीनेका और जन्मका लाभ तथा नेत्रोंका फल तो इतना ही है, जो आज पूरा-पूरा प्राप्त कर लिया ॥ २ ॥ कामदेवरूप ग्वालेने मानो शोभारूप सुरभीसे शृङ्गाररूप दुहकर जो अमृतमय दही तैयार किया था उसे मथकर ही मक्खनरूप राम और सीता रचे हैं तथा सारे लोकोंकी शोभा उससे रहा-सहा मट्ठा है ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, उस जोड़ीको देखनेसे बड़ा सुख होता है; उसकी अतुलित शोभा कही नहीं जाती। उन्हें विधाताने मानो रूपकी राशि ही बनाया है तथा रति और कामको तो उनका केवल सीला¹ और लवनी² ही मिला है ॥ ४ ॥ [ १०७ ] जैसे ललित लषन लाल लोने। तैसिये ललित उरमिला, परसं पर लखत सुलोचन कोने ॥ १ ॥ १. जो दाने खेत काटनेके अनन्तर पृथ्वीमें पड़े रह जाते हैं। २. अन्नका वह थोड़ा-सा भाग जो खेत काटनेवालोंको मजदूरीमें दिया जाता है।
१६६ बालकाण्ड सुखमासार सिंगारसार करि कनक रचे हैं तिहि सोने । रूपप्रेम-परमिति न परत कहि, बिथकि रही मति मौने ॥ २ ॥ सोभा-सील-सनेह सोहावना, समउ केलिगृह गौने । लेखि तियनिके नयन सफल भये, तुलसीदासहूके होने ॥ ३ ॥ जैसे सुन्दर लावण्यधाम श्रीलषणलाल हैं वैसी ही सुन्दरी ऊर्मिलाजी भी हैं। वे दोनों एक दूसरेको नेत्रोंकी कनखियोंसे देख रहे हैं ॥ १ ॥ सुषमा और शृङ्गारके सारका सुवर्ण बनाकर फिर उस सुवर्णसे ही मानो ये मूर्तियाँ रची हैं। इनके रूप और प्रेमकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा सकता; बुद्धि थककर मौन हो गयी है ॥ २ ॥ जिस समय वे क्रीडाभवनमें गये उस समय उनकी शोभा, शील और सुहावना स्नेह देखकर स्त्रियोंके नेत्र सफल हो गये और अब तुलसीदासके भी होनेवाले हैं ॥ ३ ॥ राग बिलावल [ १०८ ] जानकी-बर सुंदर, माई । इंद्रनील-मनि-स्याम सुभग, अँग-अंग मनोजनि बहु छबि छाई ॥ १ ॥ अरुन चरन, अंगुली मनोहर, नख दुतिवंत, कछुक अरुनाई । कंजदलनिपर मनहु भौम दस बैठे अचल सुसदसि बनाई ॥ २ ॥ पीन जानु, उर चारु, जटिल मनि नूपुर पद कल मुखर सोहाई । पीत पराग भरे अलिगन जनु जुगल जलज लखि रहे लोभाई ॥ ३ ॥ किंकिंनि कनक कंज अवली मृदु मरकत सिखरमध्य जनु जाई । गई न उपर, सभीत नमित मुख, बिकसि चहुँ दिसि रही लोनाई ॥ ४ ॥ नाभि गंभीर, उदर रेखा बर उर भृगु-चरन-चिह्न सुखदाई । भुज प्रलंब भूषन अनेक जुत, बसन पीत सोभा अधिकाई ॥ ५ ॥
गीतावली १७०
जग्योपबीत बिचित्र हेममय, मुक्तामाल उरसि मोहि भाई। कंद-तड़ित बिच जनु सुरपति-धनु रुचिर बलाकपांति चलि आई ॥ ६ ॥ कंबु कंठ, चिबुकाधर सुंदर, क्यों कहौं दसननकी रुचिराई। पदुमकोस महँ बसे बज्र मनो निज सँग तड़ित-अरुन-रुचि लाई ॥ ७ ॥ नासिक चारु, ललित लोचन, भ्रू कुटिल, कचनि अनुपम छबि पाई। रहे घेरि राजीव उभय मनो चंचरीक कछु हृदय डेराई ॥ ८ ॥ भाल तिलक, कंचनाकिरीट सिर, कुंडल लोल कपोलनि झाँई। निरखहिं नारि-निकर बिदेहपुर निमि नृपकी मरजाद मिटाई ॥ ९ ॥ सारद-सेस-संभु निसि-बासर चितत रूप, न हृदय समाई। तुलसिदास सठ क्यों करि बरनै यह छबि, निगम नेति कह गाई ॥१०॥
अरी माई! जानकीके वर बड़े ही सुन्दर हैं। इनका सुन्दर शरीर इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण है तथा अङ्ग-अङ्गमें अनेकों कामदेवोंकी छबि छायी हुई-है ॥ १ ॥ इनके चरण अरुणवर्ण, अँगुलियाँ मनोहर तथा नख कान्तिमय और कुछ-कुछ ललिमा लिये हैं, मानो कमलकी पङ्खुड़ियोंपर दस मङ्गल ग्रह निश्चल होकर अपनी सभा बनाकर बैठे हैं ॥ २ ॥ इनके घुटने स्थूल हैं, वक्षःस्थल सुन्दर है तथा चरणोंमें सुन्दर ध्वनि करनेवाले मणिमय नूपुर हैं जो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो भ्रमरगण दो पीत पराग भरे हुए कमलोंको देखकर उन्हीमें लुभाकर रह गये हों ॥ ३ ॥ कमरमें जो सुवर्णमयी करधनी है वह मानो सुवर्णवर्ण सरसिजोंकी माला ही है; जो मरकत- मणिके पर्वतके मध्य भागमें उत्पन्न हुई है और मुखचन्द्रसे भयभीत होकर ऊपरको नहीं गयी, बल्कि नीचेको मुख करके रह गयी है। उसकी सुन्दरता दसों दिशाओंमें फैली हुई है ॥ ४ ॥ भगवान्की नाभि गम्भीर है, उदरदेशमें सुन्दर रेखाएँ हैं, हृदयपर परम सुख-
१७१ बालकाण्ड दायक भृगुजीका चरणचिह्न है, अनेकों आभूषणोंसे युक्त लम्बी-लम्बी भुजाएँ हैं तथा पीताम्बरकी अतिशय शोभा हो रही है ॥ ५ ॥ प्रभुके हृदयमें मुझे अति विचित्र सुवर्णवर्ण यज्ञोपवीत तथा मोतियोंकी माला प्रिय जान पड़ती है, मानो बादल और बिजलीके बीचमें इन्द्रधनुष उदित हो और वहीं बगुलोंकी पंक्ति भी आ गयी हो । [यहाँ श्याम शरीर मेघ है, पीताम्बर बिजली है, यज्ञोपवीत इन्द्रधनुष है और मोतियोंकी माला बगुलोंकी पंक्ति है] ॥ ६ ॥ भगवान्का कण्ठ शङ्खके समान है; चिबुक और अधर सुन्दर हैं तथा दांतोंकी सुन्दरताका तो मैं वर्णन ही किस प्रकार करूँ ? मानो साक्षात् वज्र (हीरे) ही बिजली और बालसूर्यकी कान्ति लेकर कमलकोशमें बसने लगा हो [यहाँ मुख कमलकोश है, दाँत वज्र हैं तथा अधर और ताम्बूलकी लालिमा ही बालसूर्यकी कान्ति और दांतोंकी चमक बिजली है ] ॥ ७ ॥ उनकी नासिका सुन्दर है, नेत्र सुहावने हैं, भृकुटियाँ टेढ़ी हैं तथा बालों ने अनुपम छवि प्राप्त की है, मानो दो कमलोंको हृदयसे कुछ-कुछ डरते हुए भौंरोंने घेर रक्खा हो । [यहाँ दोनों नेत्र कमल हैं और भृकुटियां भौंरे हैं] ॥ ८ ॥ प्रभुके माथेपर तिलक है, सिरपर सुवर्णमय मुकुट है, कानोंमें हिलते हुए कुण्डल हैं जिनकी कपोलोंपर झांई पड़ती है। उन्हें देखकर जनक- पुरकी स्त्रियोंने निमिकुलकी मर्यादा मिटा दी [अर्थात् सब पलक मारना छोड़कर एकटक देखती रह गयी हैं] ॥ ९ ॥ शारदा, शेष और महादेवजी रात-दिन प्रभुके स्वरूपका चिन्तन करते हैं, फिर भी उनके हृदयमें वह नहीं समाता । फिर दुष्ट तुलसीदास ही इस छविका कैसे वर्णन कर सकता है, जिसे वेदने भी 'नेति-नेति' ही कहकर गाया है ॥ १० ॥
गीतावली १७२ अयोध्या-आगमन राग कान्हरा [ १०९ ] भुजनिपर जननी वारि-फेरि डारी। क्यों तोरचो कोमलकर-कमलनि संभु-सरासन भारी ? ॥ १ ॥ क्यों मारीच सुबाहु महाबल प्रबल ताड़का मारी ? । मुनि-प्रसाद मेरे राम-लषनकी बिधि-बड़ि करवर टारी ॥ २ ॥ चरनरेनु लै नयननि लावति, क्यों मुनिबधू उधारी । कहौ धौं तात ! क्यों जीति सकल नृप बरी है बिदेहकुमारी ॥ ३ ॥ दुसह-रोष-मूरति भृगुपति अति नृपति-निकर-खयकारी । क्यों सौंप्यो सारंग हारि हिय, करी है बहुत मनुहारी ॥ ४ ॥ उमगि आनंद बिलोकति बधुसहित सुत चारी । तुलसिदास आरती उतारति प्रेम-मगन महतारी ॥ ५ ॥ माता कौसल्या भगवान् रामकी भुजाओंपर वार-फेर करती हैं और कहती हैं—'भला, इन कोमल करकमलोंसे महादेवजीका भारी धनुष किस प्रकार तोड़ा होगा ॥ १ ॥ इनसे महाबली मारीच और सुबाहु तथा प्रबल ताड़काको भी कैसे मारा होगा ; विश्वामित्र- जीकी कृपासे विधाताने मेरे लाल राम और लक्ष्मणकी बड़ी भारी आपत्ति टाल दी है' ॥ २ ॥ फिर भगवान्के चरणोंकी रज लेकर नेत्रोंसे लगाती हैं और कहती हैं—'हे तात ! कहो तो तुमने किस प्रकार मुनिपत्नीका उद्धार किया ? और कैसे सारे राजाओंको जीत- कर जानकीको विवाहा ? ॥ ३ ॥ परशुराम तो दुःसह क्रोधकी मूर्ति और नृपसमूहका क्षय करनेवाले हैं। उन्होंने हृदयमें हारकर किस
बालकाण्ड १७३ प्रकार तुम्हें शाङ्गं धनुष सौंप दिया और कैसे तुम्हारी बहुत कुछ अनुनय-विनय की ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार प्रेममें मग्न होकर माता कौसल्या आरती उतारती हैं और आनन्दसे उमँग-उमँगकर बधुओंके सहित चारों पुत्रोंको देखती हैं ॥ ५ ॥ [ ११० ] मुदित-मन आरती करै माता । कनक-बसन-मनि वारि-वारि करि, पुलक प्रफुल्लित गाता ॥ १ ॥ पालागनि दुलहियन सिखावति सरिस सासु सत-साता । देहिं असीस ते 'बरिस कोटि लगि अचल होउ अहिबाता' ॥ २ ॥ राम सीय-छबि देखि जुवतिजन करहिं परसपर बाता । 'अब जान्यो, साँचहु सुनहु, सखि ! कोबिद बड़ो बिधाता ॥ ३ ॥ मंगल-गान निसान नगर-नभ, आनंद कह्यो न जाता । चिरजीवहु अवधेस-सुवन सब तुलसिदास-सुखदाता ॥ ४ ॥ माता कौसल्या सुवर्ण, वस्त्र और मणि निछावर कर प्रेमसे पुलकित और प्रफुल्लित हो प्रसन्न मनसे आरती करती हैं ॥ १ ॥ वे दुलहिनोंको अपने ही समान अन्य सात सौ सासुओंके भी पांवों लगना सिखाती हैं और वे सब आशीर्वाद देती हैं कि 'तुम्हारा सुहाग करोड़ों वर्षतक अचल रहे' ॥ २ ॥ राम और सीताकी छबि देखकर युवतियां आपसमें बातें करती हैं कि 'अरी सखि ! सुन, हमने तो अब जाना है कि विधाता बड़ा ही चतुर है' ॥ ३ ॥ नगर और आकाशमें मङ्गलगान हो रहा है और बाजे बज रहे हैं, उस समयका आनन्द कहा नहीं जाता । [ सब लोग यही आशीर्वाद दे रहे हैं कि ] तुलसीदासको सुख देनेवाले अवधेशके सभी पुत्र चिरजीवी हों ॥ ४ ॥
श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली अयोध्याकाण्ड राज्याभिषेककी तैयारी राग सोरठ [ १ ] नृप कर जोरि कह्यो गुर पाहीं । तुम्हरी कृपा असीस, नाथ ! मेरी सबै महेस निबाहीं ॥ १ ॥ राम होंहि जुबराज जियत मेरे, यह लालच मन माहीं । बहुरि मोहि जियबे-मरिबेकी चित चिंता कछु नाहीं ॥ २ ॥ महाराज, भलों काज बिचारयो, बेगि बिलंब न कीजै । बिधि दाहिनो होइ तौ सब मिलि जनम-लाहु लुटि लीजै ॥ ३ ॥ सुनत नगर आनंद बधावन, कैकेयी बिलखानी । तुलसीदास देवमायाबस कठिन कुटिलता ठानी ॥ ४ ॥ महाराज दशरथने हाथ जोड़कर गुरुजीसे कहा—‘हे नाथ ! आपकी कृपा और आशीर्वादसे महादेवजीने मेरी सभी कामनाएँपूर्णकर दी हैं ॥ १॥ अब तो मेरे मनमें यही लालच है कि मेरे जीते-जी श्रीराम युवराज हो जायें । फिर मुझे अपने जीने-मरनेकी चित्तमें कुछ भी चिन्ता नहीं है’ ॥ २ ॥ [ यह सुनकर वसिष्ठजीबोले— ] ‘राजन् ! तुम- ने बहुत अच्छा कार्य सोचा है । इसे शीघ्र ही करना चाहिये, देरी मत करो । यदि विधाता अनुकूल रहे तो सबके साथ मिलकर
१७५ अयोध्याकाण्ड यह जीवन का लाभ लूट लो' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय नगरमें [रामराज्याभिषेकसम्बन्धी] आनन्दमय बधाई सुनकर कैकेयी व्याकुल हो गयी और देवमायाके वशीभूत हो उसने कठिन कुटिलता धारण कर ली ॥ ४ ॥ वनके लिये विदाई राग गौरी [ २ ] सुनहु राम मेरे प्रानपियारे । वारौं सत्य बचन श्रुति-सम्मत, जाते हौं बिछुरत चरन तिहारे ॥ १ ॥ बिनु प्रयास सब साधनको फल प्रभु पायो, सो तो नाहिं सँभारे । हरि तजि धरमसील भयो चाहत, नृपति नारि बस सरबस हारे ॥ २ ॥ रुचिर कांचमनि देखि मूढ़ ज्यों करतलतें चिंतामनि डारे । मुनि-लोचन-चकोर-ससि राघव, सिव-जीवनधन, सोउ न बिचारे ॥ ३ ॥ जद्यपि नाथ तात ! मायाबस सुखनिधान सुत तुम्हहिं बिसारे । तदपि हमहि त्यागहु जनि रघुपति, दीनबन्धु, दयालु मेरे बारे ॥ ४ ॥ अतिसय प्रति बिनीत बचन सुनि, प्रभु कोमल चित चलत न पारे । तुलसिदास जौ रहौं मातु-हित, को सुर-विप्र-भूमि-भय टारे ? ॥ ५ ॥ [भगवान् रामके मुखसे वनगमनका प्रस्ताव सुन माता कौसल्या कहने लगीं—] "मेरे प्राणधार राम ! सुनो, जिनके कारण तुम्हारे चरणोंका वियोग होता हो, उन श्रुतिसम्मत सत्य वचनोंको मैं तुम्हारे ऊपर निछावर करती हूँ ॥ १ ॥ जो सारे साधनोंका फल है, उस प्रभु को अनायास ही प्राप्त कर लिया । फिर भी उसकी तो सँभाल की नहीं, अब श्रीहरिको त्याग कर धर्मशील होने चले हैं ।
गीतावली १७६ हाय ! राजाने स्त्रीके वशीभूत होकर अपना सर्वस्व हार दिया ॥ २ ॥ जैसे मूढ़ पुरुष सुन्दर कांचमणि देखकर हाथसे चिन्तामणि गिरा देता है । ‘राम मुनीश्वरोंके नेत्ररूप चकोरोंके लिये चन्द्रमा हैं और साक्षात् श्रीशंकरके प्राणसर्वस्व हैं ।’ राजाने तो इस बातका भी विचार नहीं किया ॥ ३ ॥ हे तात ! यद्यपि स्वामी ने माया के वशीभूत होकर ही अपने सुखनिधान पुत्र तुम्हें त्याग दिया है, तथापि हे दीनबन्धु, हे दयामय, हे मेरे लाल रघुनन्दन ! तुम हमें तो मत छोड़ो” ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, । माता के ये अतिशय प्रीति और विनययुक्त वचन सुनकर कोमलहृदय भगवान् राम वहांसे चल न सके और सोंचने लगे—‘यदि मैं माताका प्रिय करनेके लिये यहीं रह जाऊँ तो देवता, ब्राह्मण और पृथ्वीका भय कौन दूर करेगा ?’ ॥ ५ ॥ [ ३ ] रहि चलिये सुंदर रघुनायक । जो सुत ! तात-बचन-पालन-रत, जननिउ तात ! मानिबे लायक ॥ १ ॥ बेद-बिदित यह बानि तुम्हारी, रघुपति सदा संत-सुखदायक । राखहु निज मरजाद निगमकी, हौं बलि जाउँ, धरहु धनुसायक ॥ २ ॥ सोक कूप पुर परिहि, मरिहि नृप, सुनि संदेस रघुनाथ-सिधायक । यह दूसन बिधि तोहि होत अब रामचरन-बियोग-उपजायक ॥ ३ ॥ मातु बचन सुनि स्रवत नयन जल, कछुसुभाउ जनु नरतनु-पायक । तुलसिदास सुर-काज न साध्यौ तौ तो दोष होय मोहि महि आयक ॥ ४ ॥ हे सुन्दर रघुनन्दन ! आप रह जाइये । बेटा ! यदि तुम पिताके वचनोंका पालन करनेमें ऐसे तत्पर हो तो हे तात ! तुम्हारे