भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 177

१७१ बालकाण्ड दायक भृगुजीका चरणचिह्न है, अनेकों आभूषणोंसे युक्त लम्बी-लम्बी भुजाएँ हैं तथा पीताम्बरकी अतिशय शोभा हो रही है ॥ ५ ॥ प्रभुके हृदयमें मुझे अति विचित्र सुवर्णवर्ण यज्ञोपवीत तथा मोतियोंकी माला प्रिय जान पड़ती है, मानो बादल और बिजलीके बीचमें इन्द्रधनुष उदित हो और वहीं बगुलोंकी पंक्ति भी आ गयी हो । [यहाँ श्याम शरीर मेघ है, पीताम्बर बिजली है, यज्ञोपवीत इन्द्रधनुष है और मोतियोंकी माला बगुलोंकी पंक्ति है] ॥ ६ ॥ भगवान्‌का कण्ठ शङ्खके समान है; चिबुक और अधर सुन्दर हैं तथा दांतोंकी सुन्दरताका तो मैं वर्णन ही किस प्रकार करूँ ? मानो साक्षात् वज्र (हीरे) ही बिजली और बालसूर्यकी कान्ति लेकर कमलकोशमें बसने लगा हो [यहाँ मुख कमलकोश है, दाँत वज्र हैं तथा अधर और ताम्बूलकी लालिमा ही बालसूर्यकी कान्ति और दांतोंकी चमक बिजली है ] ॥ ७ ॥ उनकी नासिका सुन्दर है, नेत्र सुहावने हैं, भृकुटियाँ टेढ़ी हैं तथा बालों ने अनुपम छवि प्राप्त की है, मानो दो कमलोंको हृदयसे कुछ-कुछ डरते हुए भौंरोंने घेर रक्खा हो । [यहाँ दोनों नेत्र कमल हैं और भृकुटियां भौंरे हैं] ॥ ८ ॥ प्रभुके माथेपर तिलक है, सिरपर सुवर्णमय मुकुट है, कानोंमें हिलते हुए कुण्डल हैं जिनकी कपोलोंपर झांई पड़ती है। उन्हें देखकर जनक- पुरकी स्त्रियोंने निमिकुलकी मर्यादा मिटा दी [अर्थात् सब पलक मारना छोड़कर एकटक देखती रह गयी हैं] ॥ ९ ॥ शारदा, शेष और महादेवजी रात-दिन प्रभुके स्वरूपका चिन्तन करते हैं, फिर भी उनके हृदयमें वह नहीं समाता । फिर दुष्ट तुलसीदास ही इस छविका कैसे वर्णन कर सकता है, जिसे वेदने भी 'नेति-नेति' ही कहकर गाया है ॥ १० ॥