गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १७२ अयोध्या-आगमन राग कान्हरा [ १०९ ] भुजनिपर जननी वारि-फेरि डारी। क्यों तोरचो कोमलकर-कमलनि संभु-सरासन भारी ? ॥ १ ॥ क्यों मारीच सुबाहु महाबल प्रबल ताड़का मारी ? । मुनि-प्रसाद मेरे राम-लषनकी बिधि-बड़ि करवर टारी ॥ २ ॥ चरनरेनु लै नयननि लावति, क्यों मुनिबधू उधारी । कहौ धौं तात ! क्यों जीति सकल नृप बरी है बिदेहकुमारी ॥ ३ ॥ दुसह-रोष-मूरति भृगुपति अति नृपति-निकर-खयकारी । क्यों सौंप्यो सारंग हारि हिय, करी है बहुत मनुहारी ॥ ४ ॥ उमगि आनंद बिलोकति बधुसहित सुत चारी । तुलसिदास आरती उतारति प्रेम-मगन महतारी ॥ ५ ॥ माता कौसल्या भगवान् रामकी भुजाओंपर वार-फेर करती हैं और कहती हैं—'भला, इन कोमल करकमलोंसे महादेवजीका भारी धनुष किस प्रकार तोड़ा होगा ॥ १ ॥ इनसे महाबली मारीच और सुबाहु तथा प्रबल ताड़काको भी कैसे मारा होगा ; विश्वामित्र- जीकी कृपासे विधाताने मेरे लाल राम और लक्ष्मणकी बड़ी भारी आपत्ति टाल दी है' ॥ २ ॥ फिर भगवान्के चरणोंकी रज लेकर नेत्रोंसे लगाती हैं और कहती हैं—'हे तात ! कहो तो तुमने किस प्रकार मुनिपत्नीका उद्धार किया ? और कैसे सारे राजाओंको जीत- कर जानकीको विवाहा ? ॥ ३ ॥ परशुराम तो दुःसह क्रोधकी मूर्ति और नृपसमूहका क्षय करनेवाले हैं। उन्होंने हृदयमें हारकर किस