भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 454 में से

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पृष्ठ 179

बालकाण्ड १७३ प्रकार तुम्हें शाङ्गं धनुष सौंप दिया और कैसे तुम्हारी बहुत कुछ अनुनय-विनय की ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार प्रेममें मग्न होकर माता कौसल्या आरती उतारती हैं और आनन्दसे उमँग-उमँगकर बधुओंके सहित चारों पुत्रोंको देखती हैं ॥ ५ ॥ [ ११० ] मुदित-मन आरती करै माता । कनक-बसन-मनि वारि-वारि करि, पुलक प्रफुल्लित गाता ॥ १ ॥ पालागनि दुलहियन सिखावति सरिस सासु सत-साता । देहिं असीस ते 'बरिस कोटि लगि अचल होउ अहिबाता' ॥ २ ॥ राम सीय-छबि देखि जुवतिजन करहिं परसपर बाता । 'अब जान्यो, साँचहु सुनहु, सखि ! कोबिद बड़ो बिधाता ॥ ३ ॥ मंगल-गान निसान नगर-नभ, आनंद कह्यो न जाता । चिरजीवहु अवधेस-सुवन सब तुलसिदास-सुखदाता ॥ ४ ॥ माता कौसल्या सुवर्ण, वस्त्र और मणि निछावर कर प्रेमसे पुलकित और प्रफुल्लित हो प्रसन्न मनसे आरती करती हैं ॥ १ ॥ वे दुलहिनोंको अपने ही समान अन्य सात सौ सासुओंके भी पांवों लगना सिखाती हैं और वे सब आशीर्वाद देती हैं कि 'तुम्हारा सुहाग करोड़ों वर्षतक अचल रहे' ॥ २ ॥ राम और सीताकी छबि देखकर युवतियां आपसमें बातें करती हैं कि 'अरी सखि ! सुन, हमने तो अब जाना है कि विधाता बड़ा ही चतुर है' ॥ ३ ॥ नगर और आकाशमें मङ्गलगान हो रहा है और बाजे बज रहे हैं, उस समयका आनन्द कहा नहीं जाता । [ सब लोग यही आशीर्वाद दे रहे हैं कि ] तुलसीदासको सुख देनेवाले अवधेशके सभी पुत्र चिरजीवी हों ॥ ४ ॥

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