गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १७०
जग्योपबीत बिचित्र हेममय, मुक्तामाल उरसि मोहि भाई। कंद-तड़ित बिच जनु सुरपति-धनु रुचिर बलाकपांति चलि आई ॥ ६ ॥ कंबु कंठ, चिबुकाधर सुंदर, क्यों कहौं दसननकी रुचिराई। पदुमकोस महँ बसे बज्र मनो निज सँग तड़ित-अरुन-रुचि लाई ॥ ७ ॥ नासिक चारु, ललित लोचन, भ्रू कुटिल, कचनि अनुपम छबि पाई। रहे घेरि राजीव उभय मनो चंचरीक कछु हृदय डेराई ॥ ८ ॥ भाल तिलक, कंचनाकिरीट सिर, कुंडल लोल कपोलनि झाँई। निरखहिं नारि-निकर बिदेहपुर निमि नृपकी मरजाद मिटाई ॥ ९ ॥ सारद-सेस-संभु निसि-बासर चितत रूप, न हृदय समाई। तुलसिदास सठ क्यों करि बरनै यह छबि, निगम नेति कह गाई ॥१०॥
अरी माई! जानकीके वर बड़े ही सुन्दर हैं। इनका सुन्दर शरीर इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण है तथा अङ्ग-अङ्गमें अनेकों कामदेवोंकी छबि छायी हुई-है ॥ १ ॥ इनके चरण अरुणवर्ण, अँगुलियाँ मनोहर तथा नख कान्तिमय और कुछ-कुछ ललिमा लिये हैं, मानो कमलकी पङ्खुड़ियोंपर दस मङ्गल ग्रह निश्चल होकर अपनी सभा बनाकर बैठे हैं ॥ २ ॥ इनके घुटने स्थूल हैं, वक्षःस्थल सुन्दर है तथा चरणोंमें सुन्दर ध्वनि करनेवाले मणिमय नूपुर हैं जो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो भ्रमरगण दो पीत पराग भरे हुए कमलोंको देखकर उन्हीमें लुभाकर रह गये हों ॥ ३ ॥ कमरमें जो सुवर्णमयी करधनी है वह मानो सुवर्णवर्ण सरसिजोंकी माला ही है; जो मरकत- मणिके पर्वतके मध्य भागमें उत्पन्न हुई है और मुखचन्द्रसे भयभीत होकर ऊपरको नहीं गयी, बल्कि नीचेको मुख करके रह गयी है। उसकी सुन्दरता दसों दिशाओंमें फैली हुई है ॥ ४ ॥ भगवान्की नाभि गम्भीर है, उदरदेशमें सुन्दर रेखाएँ हैं, हृदयपर परम सुख-