गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ बालकाण्ड सुखमासार सिंगारसार करि कनक रचे हैं तिहि सोने । रूपप्रेम-परमिति न परत कहि, बिथकि रही मति मौने ॥ २ ॥ सोभा-सील-सनेह सोहावना, समउ केलिगृह गौने । लेखि तियनिके नयन सफल भये, तुलसीदासहूके होने ॥ ३ ॥ जैसे सुन्दर लावण्यधाम श्रीलषणलाल हैं वैसी ही सुन्दरी ऊर्मिलाजी भी हैं। वे दोनों एक दूसरेको नेत्रोंकी कनखियोंसे देख रहे हैं ॥ १ ॥ सुषमा और शृङ्गारके सारका सुवर्ण बनाकर फिर उस सुवर्णसे ही मानो ये मूर्तियाँ रची हैं। इनके रूप और प्रेमकी सीमाका वर्णन नहीं किया जा सकता; बुद्धि थककर मौन हो गयी है ॥ २ ॥ जिस समय वे क्रीडाभवनमें गये उस समय उनकी शोभा, शील और सुहावना स्नेह देखकर स्त्रियोंके नेत्र सफल हो गये और अब तुलसीदासके भी होनेवाले हैं ॥ ३ ॥ राग बिलावल [ १०८ ] जानकी-बर सुंदर, माई । इंद्रनील-मनि-स्याम सुभग, अँग-अंग मनोजनि बहु छबि छाई ॥ १ ॥ अरुन चरन, अंगुली मनोहर, नख दुतिवंत, कछुक अरुनाई । कंजदलनिपर मनहु भौम दस बैठे अचल सुसदसि बनाई ॥ २ ॥ पीन जानु, उर चारु, जटिल मनि नूपुर पद कल मुखर सोहाई । पीत पराग भरे अलिगन जनु जुगल जलज लखि रहे लोभाई ॥ ३ ॥ किंकिंनि कनक कंज अवली मृदु मरकत सिखरमध्य जनु जाई । गई न उपर, सभीत नमित मुख, बिकसि चहुँ दिसि रही लोनाई ॥ ४ ॥ नाभि गंभीर, उदर रेखा बर उर भृगु-चरन-चिह्न सुखदाई । भुज प्रलंब भूषन अनेक जुत, बसन पीत सोभा अधिकाई ॥ ५ ॥