भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

गीतावली १६८ सुखमा सुरभि सिगार-छीर दुहि मयन अमियमय कियो है दही, री। मथि माखन सिय-राम सँवारे, सकल भुवन छबि मनहु मरी, री ॥ ३ ॥ तुलसिदास जोरी देखत सुख सोभा अतुल, न जाति कही, री। रूप-रासि बिरची बिरंचि मनो, सिला लवनि रति-काम लही री ॥ ४ ॥ राम दूलह हैं और सीता दुलहिन हैं। दोनोंका मेघ और बिजलीके समान सुन्दर वर्ण है तथा नखसे लेकर शिखापर्यन्त मनको चुरानेवाली सुन्दरता छायी हुई है ॥ १ ॥ इन्हें विवाहके वस्त्रा- भूषणोंसे अलंकृत देख सारा सखीसमाज ठगा-सा रह गया है। वास्तवमें जीनेका और जन्मका लाभ तथा नेत्रोंका फल तो इतना ही है, जो आज पूरा-पूरा प्राप्त कर लिया ॥ २ ॥ कामदेवरूप ग्वालेने मानो शोभारूप सुरभीसे शृङ्गाररूप दुहकर जो अमृतमय दही तैयार किया था उसे मथकर ही मक्खनरूप राम और सीता रचे हैं तथा सारे लोकोंकी शोभा उससे रहा-सहा मट्ठा है ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, उस जोड़ीको देखनेसे बड़ा सुख होता है; उसकी अतुलित शोभा कही नहीं जाती। उन्हें विधाताने मानो रूपकी राशि ही बनाया है तथा रति और कामको तो उनका केवल सीला¹ और लवनी² ही मिला है ॥ ४ ॥ [ १०७ ] जैसे ललित लषन लाल लोने। तैसिये ललित उरमिला, परसं पर लखत सुलोचन कोने ॥ १ ॥ १. जो दाने खेत काटनेके अनन्तर पृथ्वीमें पड़े रह जाते हैं। २. अन्नका वह थोड़ा-सा भाग जो खेत काटनेवालोंको मजदूरीमें दिया जाता है।

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक) · पृष्ठ 174, कुल 454 में से · BharatKosha