गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली १७०
जग्योपबीत बिचित्र हेममय, मुक्तामाल उरसि मोहि भाई। कंद-तड़ित बिच जनु सुरपति-धनु रुचिर बलाकपांति चलि आई ॥ ६ ॥ कंबु कंठ, चिबुकाधर सुंदर, क्यों कहौं दसननकी रुचिराई। पदुमकोस महँ बसे बज्र मनो निज सँग तड़ित-अरुन-रुचि लाई ॥ ७ ॥ नासिक चारु, ललित लोचन, भ्रू कुटिल, कचनि अनुपम छबि पाई। रहे घेरि राजीव उभय मनो चंचरीक कछु हृदय डेराई ॥ ८ ॥ भाल तिलक, कंचनाकिरीट सिर, कुंडल लोल कपोलनि झाँई। निरखहिं नारि-निकर बिदेहपुर निमि नृपकी मरजाद मिटाई ॥ ९ ॥ सारद-सेस-संभु निसि-बासर चितत रूप, न हृदय समाई। तुलसिदास सठ क्यों करि बरनै यह छबि, निगम नेति कह गाई ॥१०॥
अरी माई! जानकीके वर बड़े ही सुन्दर हैं। इनका सुन्दर शरीर इन्द्रनीलमणिके समान श्यामवर्ण है तथा अङ्ग-अङ्गमें अनेकों कामदेवोंकी छबि छायी हुई-है ॥ १ ॥ इनके चरण अरुणवर्ण, अँगुलियाँ मनोहर तथा नख कान्तिमय और कुछ-कुछ ललिमा लिये हैं, मानो कमलकी पङ्खुड़ियोंपर दस मङ्गल ग्रह निश्चल होकर अपनी सभा बनाकर बैठे हैं ॥ २ ॥ इनके घुटने स्थूल हैं, वक्षःस्थल सुन्दर है तथा चरणोंमें सुन्दर ध्वनि करनेवाले मणिमय नूपुर हैं जो ऐसे जान पड़ते हैं, मानो भ्रमरगण दो पीत पराग भरे हुए कमलोंको देखकर उन्हीमें लुभाकर रह गये हों ॥ ३ ॥ कमरमें जो सुवर्णमयी करधनी है वह मानो सुवर्णवर्ण सरसिजोंकी माला ही है; जो मरकत- मणिके पर्वतके मध्य भागमें उत्पन्न हुई है और मुखचन्द्रसे भयभीत होकर ऊपरको नहीं गयी, बल्कि नीचेको मुख करके रह गयी है। उसकी सुन्दरता दसों दिशाओंमें फैली हुई है ॥ ४ ॥ भगवान्की नाभि गम्भीर है, उदरदेशमें सुन्दर रेखाएँ हैं, हृदयपर परम सुख-
१७१ बालकाण्ड दायक भृगुजीका चरणचिह्न है, अनेकों आभूषणोंसे युक्त लम्बी-लम्बी भुजाएँ हैं तथा पीताम्बरकी अतिशय शोभा हो रही है ॥ ५ ॥ प्रभुके हृदयमें मुझे अति विचित्र सुवर्णवर्ण यज्ञोपवीत तथा मोतियोंकी माला प्रिय जान पड़ती है, मानो बादल और बिजलीके बीचमें इन्द्रधनुष उदित हो और वहीं बगुलोंकी पंक्ति भी आ गयी हो । [यहाँ श्याम शरीर मेघ है, पीताम्बर बिजली है, यज्ञोपवीत इन्द्रधनुष है और मोतियोंकी माला बगुलोंकी पंक्ति है] ॥ ६ ॥ भगवान्का कण्ठ शङ्खके समान है; चिबुक और अधर सुन्दर हैं तथा दांतोंकी सुन्दरताका तो मैं वर्णन ही किस प्रकार करूँ ? मानो साक्षात् वज्र (हीरे) ही बिजली और बालसूर्यकी कान्ति लेकर कमलकोशमें बसने लगा हो [यहाँ मुख कमलकोश है, दाँत वज्र हैं तथा अधर और ताम्बूलकी लालिमा ही बालसूर्यकी कान्ति और दांतोंकी चमक बिजली है ] ॥ ७ ॥ उनकी नासिका सुन्दर है, नेत्र सुहावने हैं, भृकुटियाँ टेढ़ी हैं तथा बालों ने अनुपम छवि प्राप्त की है, मानो दो कमलोंको हृदयसे कुछ-कुछ डरते हुए भौंरोंने घेर रक्खा हो । [यहाँ दोनों नेत्र कमल हैं और भृकुटियां भौंरे हैं] ॥ ८ ॥ प्रभुके माथेपर तिलक है, सिरपर सुवर्णमय मुकुट है, कानोंमें हिलते हुए कुण्डल हैं जिनकी कपोलोंपर झांई पड़ती है। उन्हें देखकर जनक- पुरकी स्त्रियोंने निमिकुलकी मर्यादा मिटा दी [अर्थात् सब पलक मारना छोड़कर एकटक देखती रह गयी हैं] ॥ ९ ॥ शारदा, शेष और महादेवजी रात-दिन प्रभुके स्वरूपका चिन्तन करते हैं, फिर भी उनके हृदयमें वह नहीं समाता । फिर दुष्ट तुलसीदास ही इस छविका कैसे वर्णन कर सकता है, जिसे वेदने भी 'नेति-नेति' ही कहकर गाया है ॥ १० ॥
गीतावली १७२ अयोध्या-आगमन राग कान्हरा [ १०९ ] भुजनिपर जननी वारि-फेरि डारी। क्यों तोरचो कोमलकर-कमलनि संभु-सरासन भारी ? ॥ १ ॥ क्यों मारीच सुबाहु महाबल प्रबल ताड़का मारी ? । मुनि-प्रसाद मेरे राम-लषनकी बिधि-बड़ि करवर टारी ॥ २ ॥ चरनरेनु लै नयननि लावति, क्यों मुनिबधू उधारी । कहौ धौं तात ! क्यों जीति सकल नृप बरी है बिदेहकुमारी ॥ ३ ॥ दुसह-रोष-मूरति भृगुपति अति नृपति-निकर-खयकारी । क्यों सौंप्यो सारंग हारि हिय, करी है बहुत मनुहारी ॥ ४ ॥ उमगि आनंद बिलोकति बधुसहित सुत चारी । तुलसिदास आरती उतारति प्रेम-मगन महतारी ॥ ५ ॥ माता कौसल्या भगवान् रामकी भुजाओंपर वार-फेर करती हैं और कहती हैं—'भला, इन कोमल करकमलोंसे महादेवजीका भारी धनुष किस प्रकार तोड़ा होगा ॥ १ ॥ इनसे महाबली मारीच और सुबाहु तथा प्रबल ताड़काको भी कैसे मारा होगा ; विश्वामित्र- जीकी कृपासे विधाताने मेरे लाल राम और लक्ष्मणकी बड़ी भारी आपत्ति टाल दी है' ॥ २ ॥ फिर भगवान्के चरणोंकी रज लेकर नेत्रोंसे लगाती हैं और कहती हैं—'हे तात ! कहो तो तुमने किस प्रकार मुनिपत्नीका उद्धार किया ? और कैसे सारे राजाओंको जीत- कर जानकीको विवाहा ? ॥ ३ ॥ परशुराम तो दुःसह क्रोधकी मूर्ति और नृपसमूहका क्षय करनेवाले हैं। उन्होंने हृदयमें हारकर किस
बालकाण्ड १७३ प्रकार तुम्हें शाङ्गं धनुष सौंप दिया और कैसे तुम्हारी बहुत कुछ अनुनय-विनय की ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस प्रकार प्रेममें मग्न होकर माता कौसल्या आरती उतारती हैं और आनन्दसे उमँग-उमँगकर बधुओंके सहित चारों पुत्रोंको देखती हैं ॥ ५ ॥ [ ११० ] मुदित-मन आरती करै माता । कनक-बसन-मनि वारि-वारि करि, पुलक प्रफुल्लित गाता ॥ १ ॥ पालागनि दुलहियन सिखावति सरिस सासु सत-साता । देहिं असीस ते 'बरिस कोटि लगि अचल होउ अहिबाता' ॥ २ ॥ राम सीय-छबि देखि जुवतिजन करहिं परसपर बाता । 'अब जान्यो, साँचहु सुनहु, सखि ! कोबिद बड़ो बिधाता ॥ ३ ॥ मंगल-गान निसान नगर-नभ, आनंद कह्यो न जाता । चिरजीवहु अवधेस-सुवन सब तुलसिदास-सुखदाता ॥ ४ ॥ माता कौसल्या सुवर्ण, वस्त्र और मणि निछावर कर प्रेमसे पुलकित और प्रफुल्लित हो प्रसन्न मनसे आरती करती हैं ॥ १ ॥ वे दुलहिनोंको अपने ही समान अन्य सात सौ सासुओंके भी पांवों लगना सिखाती हैं और वे सब आशीर्वाद देती हैं कि 'तुम्हारा सुहाग करोड़ों वर्षतक अचल रहे' ॥ २ ॥ राम और सीताकी छबि देखकर युवतियां आपसमें बातें करती हैं कि 'अरी सखि ! सुन, हमने तो अब जाना है कि विधाता बड़ा ही चतुर है' ॥ ३ ॥ नगर और आकाशमें मङ्गलगान हो रहा है और बाजे बज रहे हैं, उस समयका आनन्द कहा नहीं जाता । [ सब लोग यही आशीर्वाद दे रहे हैं कि ] तुलसीदासको सुख देनेवाले अवधेशके सभी पुत्र चिरजीवी हों ॥ ४ ॥
श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली अयोध्याकाण्ड राज्याभिषेककी तैयारी राग सोरठ [ १ ] नृप कर जोरि कह्यो गुर पाहीं । तुम्हरी कृपा असीस, नाथ ! मेरी सबै महेस निबाहीं ॥ १ ॥ राम होंहि जुबराज जियत मेरे, यह लालच मन माहीं । बहुरि मोहि जियबे-मरिबेकी चित चिंता कछु नाहीं ॥ २ ॥ महाराज, भलों काज बिचारयो, बेगि बिलंब न कीजै । बिधि दाहिनो होइ तौ सब मिलि जनम-लाहु लुटि लीजै ॥ ३ ॥ सुनत नगर आनंद बधावन, कैकेयी बिलखानी । तुलसीदास देवमायाबस कठिन कुटिलता ठानी ॥ ४ ॥ महाराज दशरथने हाथ जोड़कर गुरुजीसे कहा—‘हे नाथ ! आपकी कृपा और आशीर्वादसे महादेवजीने मेरी सभी कामनाएँपूर्णकर दी हैं ॥ १॥ अब तो मेरे मनमें यही लालच है कि मेरे जीते-जी श्रीराम युवराज हो जायें । फिर मुझे अपने जीने-मरनेकी चित्तमें कुछ भी चिन्ता नहीं है’ ॥ २ ॥ [ यह सुनकर वसिष्ठजीबोले— ] ‘राजन् ! तुम- ने बहुत अच्छा कार्य सोचा है । इसे शीघ्र ही करना चाहिये, देरी मत करो । यदि विधाता अनुकूल रहे तो सबके साथ मिलकर
१७५ अयोध्याकाण्ड यह जीवन का लाभ लूट लो' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय नगरमें [रामराज्याभिषेकसम्बन्धी] आनन्दमय बधाई सुनकर कैकेयी व्याकुल हो गयी और देवमायाके वशीभूत हो उसने कठिन कुटिलता धारण कर ली ॥ ४ ॥ वनके लिये विदाई राग गौरी [ २ ] सुनहु राम मेरे प्रानपियारे । वारौं सत्य बचन श्रुति-सम्मत, जाते हौं बिछुरत चरन तिहारे ॥ १ ॥ बिनु प्रयास सब साधनको फल प्रभु पायो, सो तो नाहिं सँभारे । हरि तजि धरमसील भयो चाहत, नृपति नारि बस सरबस हारे ॥ २ ॥ रुचिर कांचमनि देखि मूढ़ ज्यों करतलतें चिंतामनि डारे । मुनि-लोचन-चकोर-ससि राघव, सिव-जीवनधन, सोउ न बिचारे ॥ ३ ॥ जद्यपि नाथ तात ! मायाबस सुखनिधान सुत तुम्हहिं बिसारे । तदपि हमहि त्यागहु जनि रघुपति, दीनबन्धु, दयालु मेरे बारे ॥ ४ ॥ अतिसय प्रति बिनीत बचन सुनि, प्रभु कोमल चित चलत न पारे । तुलसिदास जौ रहौं मातु-हित, को सुर-विप्र-भूमि-भय टारे ? ॥ ५ ॥ [भगवान् रामके मुखसे वनगमनका प्रस्ताव सुन माता कौसल्या कहने लगीं—] "मेरे प्राणधार राम ! सुनो, जिनके कारण तुम्हारे चरणोंका वियोग होता हो, उन श्रुतिसम्मत सत्य वचनोंको मैं तुम्हारे ऊपर निछावर करती हूँ ॥ १ ॥ जो सारे साधनोंका फल है, उस प्रभु को अनायास ही प्राप्त कर लिया । फिर भी उसकी तो सँभाल की नहीं, अब श्रीहरिको त्याग कर धर्मशील होने चले हैं ।
गीतावली १७६ हाय ! राजाने स्त्रीके वशीभूत होकर अपना सर्वस्व हार दिया ॥ २ ॥ जैसे मूढ़ पुरुष सुन्दर कांचमणि देखकर हाथसे चिन्तामणि गिरा देता है । ‘राम मुनीश्वरोंके नेत्ररूप चकोरोंके लिये चन्द्रमा हैं और साक्षात् श्रीशंकरके प्राणसर्वस्व हैं ।’ राजाने तो इस बातका भी विचार नहीं किया ॥ ३ ॥ हे तात ! यद्यपि स्वामी ने माया के वशीभूत होकर ही अपने सुखनिधान पुत्र तुम्हें त्याग दिया है, तथापि हे दीनबन्धु, हे दयामय, हे मेरे लाल रघुनन्दन ! तुम हमें तो मत छोड़ो” ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, । माता के ये अतिशय प्रीति और विनययुक्त वचन सुनकर कोमलहृदय भगवान् राम वहांसे चल न सके और सोंचने लगे—‘यदि मैं माताका प्रिय करनेके लिये यहीं रह जाऊँ तो देवता, ब्राह्मण और पृथ्वीका भय कौन दूर करेगा ?’ ॥ ५ ॥ [ ३ ] रहि चलिये सुंदर रघुनायक । जो सुत ! तात-बचन-पालन-रत, जननिउ तात ! मानिबे लायक ॥ १ ॥ बेद-बिदित यह बानि तुम्हारी, रघुपति सदा संत-सुखदायक । राखहु निज मरजाद निगमकी, हौं बलि जाउँ, धरहु धनुसायक ॥ २ ॥ सोक कूप पुर परिहि, मरिहि नृप, सुनि संदेस रघुनाथ-सिधायक । यह दूसन बिधि तोहि होत अब रामचरन-बियोग-उपजायक ॥ ३ ॥ मातु बचन सुनि स्रवत नयन जल, कछुसुभाउ जनु नरतनु-पायक । तुलसिदास सुर-काज न साध्यौ तौ तो दोष होय मोहि महि आयक ॥ ४ ॥ हे सुन्दर रघुनन्दन ! आप रह जाइये । बेटा ! यदि तुम पिताके वचनोंका पालन करनेमें ऐसे तत्पर हो तो हे तात ! तुम्हारे
१७७ अयोध्याकाण्ड लिये माता भी तो माननीया है ॥ १॥ तुम्हारा यह स्वभाव तो वेदमें भी विख्यात है कि रघुनाथजी सर्वदा सत्पुरुषोंको सुख देनेवाले हैं। अतः मैं बलिहारी जाऊँ, तुम अपनी वेदोक्त मर्यादाकी रक्षा करो और धनुष-बाण उतारकर रख दो ॥ २ ॥ रामके वनगमनका समाचार पाते ही सारा नगर शोककूपमें डूब जायगा और महाराज भी प्राण छोड़ देंगे। अरे, रामचरणोंसे बिछोह करानेवाले विधाता ! देख, यह दोष अब तेरे ऊपर आनेवाला है ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, माताके ये वचन सुनकर प्रभु नेत्रोंसे जल बहाने लगे, मानो कुछ तो यह नर-देह पानेका स्वभाव था और कुछ यह विचार भी था कि यदि मैंने देवताओंका कार्य पूर्ण न किया तो मुझे पृथ्वीमें आनेका दोष ही लगेगा ॥ ४ ॥ राग सोरठ [ ४ ] राम ! हौं कौन जतन घर रहिहौं ? बार बार भरि अंक गोद लै ललन कौनसों कहिहौं ॥ १ ॥ इहि आँगन बिहरत मेरे बारे ! तुम जो संग सिसु लीन्हें । कैसे प्रान रहत सुमिरत सुत, बहु बिनोद तुम कीन्हें ॥ २ ॥ जिन्ह श्रवननि कल बचन तिहारे सुनि सुनि हौं अनुरागी । तिन्ह श्रवननि बनगवन सुनति हौं मोतें कौन अभागी ? ॥ ३ ॥ जुग सम निमिष जाहिं रघुनंदन, बदनकमल बिनु देखे । जौ तनु रहै बरष बीते, बलि, कहा प्रीति इहि लेखे ? ॥ ४ ॥ तुलसीदास प्रेमबस श्रीहरि देखि बिकल महतारी । गदगद कंठ, नयन जल, फिरि फिरि आवन कह्यो मुरारी ॥ ५ ॥ गी० १२—
गीतावली १७८ (माता कौसल्या कहने लगी—) 'बेटा राम ! मैं किस प्रकार घरमें रह सकूँगी; मैं बारंबार अंक भरकर गोदमें ले किससे 'लाल' कहकर बोलूँगी; ॥ १ ॥ मेरे लाल ! तुम जो बहुत-से बालकोंको साथमें लेकर इस आँगनमें विहार किया करते थे सो हे बेटा ! तुम्हारी उन बहुत-सी बाललीलाओंको याद कर-करके मेरे प्राण कैसे रह सकेंगे; ॥ २ ॥ जिन कानोंसे तुम्हारे सुन्दर बोल सुन-सुनकर मैं स्नेहमें डूब जाती थी, आज उन्हींसे तुम्हारे वनगमनका समाचार सुन रही हूँ। भला, मुझसे अधिक अभागिनी और कौन होगी ॥ ३ ॥ हे राम ! तुम्हारा मुखारविन्द न देखनेपर तो मुझे एक-एक निमेष युगके समान बीतता है; अब यदि (चौदह) वर्ष बीतनेपर भी यह शरीर रह गया तो बेटा ! बलिहारी जाऊँ, इसकी तुम्हारे प्रति क्या प्रीति समझी जायगी;' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, माताको इस प्रकार व्याकुल देख श्रीहरि प्रेम से अधीर हो गये। उनका कण्ठ भर आया, नेत्रों से जल बहने लगा और उन्होंने बार-बार शीघ्र ही लौट आनेके लिये कहा ॥ ५ ॥ राग बिलावल [ ५ ] रहहु भवन हमरे कहे, कामिनि । सादर सासु-चरन सेवहु नित, जो तुम्हरे अति हित, गृह-स्वामिनि ॥१॥ राजकुमारि ! कठिन कंटक मग, क्यों चलिहौ मृदु पद गजगामिनि । दुसह बात, बरषा, हिम, आतप कैसे सहिहौ अगनित दिन जामिनि ॥२॥ हौं पुनि पितु-आग्या प्रमान करि ऐहौं बेगि सुनहु द्युति-दामिनि । तुलसिदास प्रभु-बिरह-बचन सुनिसहिन सकी, मुरछित भई भामिनि ॥३॥
१७६ अयोध्याकाण्ड [फिर सीताजीको साथ चलनेके लिये हठ करती देख भगवान् रामने कहा—] हे प्रिये ! हमारे कहनेसे तुम घर ही रहो । हे गृहस्वामिनी ! तुम सासके चरणोंकी सर्वदा आदरपूर्वक सेवा करो, यह तुम्हारे लिये अत्यन्त भली बात होगी ॥ १ ॥ हे राजकुमारि ! वनका मार्ग बड़ा ही कठिन और कण्टकाकीर्ण हैं। हे गंजगामिनि ! तुम अपने कोमल चरणो से उसपर कैसे चल सकोगी ; अगणित दिन और रात्रियों तक तुम दुःसह वायु, वर्षा शीत और घाम कैसे सहन कर सकोगी ; ॥ २ ॥ हे विद्युत्कान्तिमयि ! मैं भी पिताजीकी आज्ञाका पालन कर शीघ्र ही लौट आऊँगा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके ये वियोगसूचक वचन सुनकर सीताजी उन्हें सह न सकीं और मूर्च्छित हो गयीं ॥ ३ ॥ [ ६ ] कृपानिधान सुजान प्रानपति, संग बिपिन ह्वै आवौंगी। गृहतेँ कोटि-गुनित सुख मारग चलत, साथ सचु पावौंगी ॥ १ ॥ थाके चरनकमल चापौंगी, श्रम भए बाउ डोलावौंगी। नयन-चकोरनि मुखमयंक-छबि सादर पान करावौंगी ॥ २ ॥ जौ हठि नाथ राखिहौ मोकहँ, तौ सँग प्रान पठावौंगी। तुलसिदास प्रभु बिनु जीवत रहि क्यों फिरि बदन देखावौंगी ? ॥ ३ ॥ [सीताजी कहने लगीं—] 'मैं अपने कृपानिधान सुजान- शिरोमणि प्राणनाथके साथ वनमें रह आऊँगी। मार्गमें आपके साथ चलते हुए सचमुच घरसे भी करोड़ों गुना सुख पाऊँगी ॥ १ ॥ जब आप थक जायँगे तो मैं आपके चरणकमल दबाऊँगी और श्रम मालूम होनेपर हवा करूँगी तथा अपने नेत्ररूप चकोरोंको आपके
गीतावली १८९ मुखचन्द्रकी छवि आदरपूर्वक पान कराऊँगी ॥ २ ॥ और हे नाथ ! यदि आप हठपूर्वक मुझे यहीं छोड़ जायँगे तो मैं लाचार होकर अपने प्राणोंको ही आपके साथ भेज दूँगी; क्योंकि आपके चले जानेपर फिर प्रभुके बिना जीवित रहकर मैं अपना मुख कैसे दिखाऊँगी;' ॥ ३ ॥ [ ७ ] कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काजु ? बिपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो पै पिय परिहरयो राजु ॥ १ ॥ बलकल बिमल दुकूल मनोहर, कंद-मूल-फल अमिय नाजु । प्रभुपद कमल बिलोकिहैं छिन छिन, इहितें अधिक कहा सुख-समाजु ? ॥ २ ॥ हौं रहौं भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनिको साजु । तुलसिदास ऐसे बिरह-बचन सुनि कठिन हियो बिहरो न आजु ॥ ३ ॥ 'कहिये, भला आपके बिना इस घरमें मेरा क्या काम है; जब प्रियतमने राज्य त्याग दिया तब मेरे लिये वन ही करोड़ों स्वर्गलोकोंके समान है ॥ १ ॥ मुझे तो वल्कल ही अति मनोहर और निर्मल दुकूल होगा और कन्द-मूल-फल ही अमृतमय अन्न होगा । अहा ! मेरे नेत्र क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंका दर्शन करेंगे—इससे अधिक और क्या सुखकी सामग्री होगी; ॥ २ ॥ हाय ! मैं तो भोगकी लालसासे राजभवनमें रहूँ और पतिदेव वनमें मुनियोंके ठाटसे निवास करें—ऐसे विरहसूचक वचनोंको सुनकर भी आज मेरा कठोर हृदय क्यों विदीर्ण नहीं हो जाता;' ॥ ३ ॥ [ ८ ] प्रिय निठुर बचन कहे कारन कवन ? जानत हौ सबके मनकी गति, मृदुचित परम कृपालु, रवन ! ॥१॥
अयोध्याकाण्ड १८१ प्राननाथ सुंदर सुजानमनि, दीनबंधु, जग-आरति-दवन । तुलसिदास प्रभु-पदसरोज तजि रहि हौं कहा करौंगी भवन ? ॥२॥ 'हे प्राणनाथ ! आज आपने ऐसे कठोर वचन किस कारणसे कहे ; हे रमण ! आप मृदुचित और परम कृपालु हैं; आप सबके मनकी गति जानते हैं ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! हे सुन्दर ! हे सुजान- शिरोमणि ! हे दीनबन्धु ! हे जगत्का दुख दूर करनेवाले ! आपके चरणकमलोंको त्यागकर मैं घरमें रहकर क्या करूँगी ; ॥ २ ॥ [ ९ ] मैं तुमसों सतिभाव कही है । बूझति और भाँति भामिनि कत, कानन कठिन कलेस सही है ॥१॥ जौ चलिहौ तौ चलो चलिकै बन, सुनि सिय मन अवलंब लही है । बूड़त बिरह-बारिनिधि मानहु नाह बचनमिस बाँह गही है ॥२॥ प्राननाथके साथ चलीं उठि, अवध सोकसरि उमगि बही है । तुलसी सुनी न कबहुँ काहु कहूँ, तनु परिहरि परिछाँहि रही है ॥३॥ [भगवान् राम बोले—] 'प्रिये ! मैंने तो तुमसे सच्चे मनसे कहा है; तुम इस प्रकार और तरह क्यों समझती हो ; वनमें सच- मुच ही बहुत क्लेश है ॥ १ ॥ यदि तुम चलना ही चाहती हो तो चलो, वनके लिये तैयार हो जाओ ।' यह सुनकर सीताजीके चित्तको सहारा मिल गया, मानो विरहरूप समुद्रमें डूबते-डूबते इस वचनके मिषसे ही पतिदेवने उनकी बाँह पकड़ ली ॥ २ ॥ वे उठकर प्राणनाथके साथ चल दीं । इस समय अयोध्यामें शोककी सरिता उमड़कर बहने लगी । तुलसीदास कहते हैं, यह तो कभी किसीने कहीं नहीं सुना कि शरीरको छोड़कर परछाईं रही हो
गीतावली १८२ (फिर इस समय भगवान् रामको छोड़कर श्रीसीताजी कैसे रह सकती थीं ? ! ॥ ३ ॥ [ १० ] जबहि रघुपति-सँग सीय चली। बिकल-बियोग लोग-पुरतिय कहैं, अति अन्याउ, अली ॥ १ ॥ कोउ कहै, मनिगन तजत काँच लगि, करत न भूप भली। कोउ कहै, कुल कुबेलि कैकेयी दुख-बिष-फलनि फली ॥ २ ॥ एक कहैं, बन जोग जानकी ! बिधि बड़े बिषम बली। तुलसी कुलिसहुकी कठोरता तेहि दिन दलकि दली ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान् रामके साथ सीताजी भी चलीं उस समय नगर के नर-नारी वियोगव्यथासे व्याकुल होकर कहने लगे—'अरी आली ! यह तो बड़ा अन्याय हो रहा है' ॥ १ ॥ कोई कहने लगे— 'राजा ने अच्छा नहीं किया। वे काँचके लिये मणियोंको त्याग रहे हैं।' कोई बोले—'कैकेयी कुलके लिये कुवेल (बुरी बेल) रूप है, जो इस समय दुःखरूप विषमय फलोंसे फली है' ॥ २ ॥ किसीने कहा—'विधाता भी बड़ा ही विषम और बलवान् है। भला ! जानकी क्या वनके योग्य हैं ;' तुलसीदासजी कहते हैं, उस दिन तो वज्रकी कठोरता भी तड़ककर नष्ट हो गयी ॥ ३ ॥ [ ११ ] ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे। उर धकधकी, न कहत कछुसकुचनि,प्रभु परिहरतसबनि तृन तोरे ॥ १ ॥ कृपासिंधु अवलोकि बंधु तन, प्रान-कृपान बीर-सी छोरे। तात बिदा माँगिए मातुसों, बनि है बात उपाइ न औरे ॥ २ ॥
१८३ अयोध्याकाण्ड जाइ चरन गहि आयसु जांची, जननि कहत बहुभांति निहोरे । सिय-रघुबर-सेवा सुचि ह्वैहौ तौ जानिहौं, सही सुत मोरे ॥३॥ कीजहु इहै बिचार निरंतर, राम समीप सुकृत नंहि थोरे । तुलसी सुनि सिष चले चकित-चित उड़यो मानो बिहग बधिक भए भोरे ॥४॥ श्रीलक्ष्मणजी करकमल जोड़े हुए खड़े हैं। उनके हृदयमें धकधकी लगी हुई है, संकोचवश कुछ कहते नहीं। बस, यही सोचते हैं—] 'हाय ! इस समय तो प्रभु सभीको तृण तोड़कर त्याग रहें हैं [न जाने, इस सेवकको भी साथ लेंगे या नहीं ; ] ॥ १ ॥ कृपासागर भगवान् रामने भाईको वीरोंके समान प्राणरूप कृपाण निकाले हुए देख [अर्थात् वीर जैसे तलवार खोले खड़े रहते हैं इसी तरह लक्ष्मणजीको प्राण निछावर करनेके लिये उद्यत देख । ] उनसे कहा—'भैया ! मातासे विदा माँग आओ, इसके सिवा किसी और तरह बात नहीं बन सकेगी' ॥ २ ॥ जब लक्ष्मणने जाकर माताके चरण पकड़कर उनसे आज्ञा माँगी, तब माताने लक्ष्मणजीसे बहुत निहोरा करके कहा—'यदि तुम राम और सीताकी सेवा करके पवित्र होगे तभी मैं तुम्हें अपना सच्चा पुत्र जानूंगी ॥ ३ ॥ तुम बारम्बार यह विचार करना कि रघुनाथजीके पास रहना कोई कम पुण्यकी बात नहीं है।' तुलसीदास कहते हैं, माता की शिक्षा सुन लक्ष्मणजी इस प्रकार चकितचित्त होकर चले जैसे वधिकको असावधान देखकर पक्षी उड़ जाता है ॥ ४ ॥ राग सोरठा [ १२ ] मोको बिधुबदन बिलोकन दीजै । राम लषन मेरी यहैं भेंट, बलि, जाउ, जहाँ मोहि मिलि लीजै ॥१॥
गीतावली १८४ सुनि पितु-बचन चरन गहे रघुपति, भूप अंक भरि लीन्हें। अजहुँ अवनि बिदरत दरार मिस सो अवसर सुधि कीन्हें ॥२॥ पुनि सिर नाइ गवन कियो प्रभु, मुरछित भयो भूप न जाग्यो। करम-चोर नृप-पथिक मारि मानो राम-रतन लै भाग्यो ॥३॥ तुलसी रबिकुल-रबि रथ चढ़ि चले तकि दिसि दखिन सुहाई। लोग नलिन भए मलिन अवध-सर, बिरह विषम हिम पाई ॥४॥ [ भगवान्को वनकी ओर जाते सुन महाराज दशरथ कहने लगे—] 'हे राम-लक्ष्मण ! मुझे अपना मुखचन्द्र देख लेने दो। अब मेरा तो यहाँकी अन्तिम भेंट है। मैं बलिहारी जाता हूँ, जहाँ भी जाओ, मुझसे मिलकर जाना' ॥ १ ॥ पिताके ये वचन सुन रघुनाथजीने उनके चरण पकड़ लिये। तब राजाने भी उन्हें छातीसे लगा लिया। उस अवसरकी याद आनेपर तो आज भी पृथ्वी दरारके मिससे विदीर्ण हो जाती है ॥ २ ॥ फिर प्रभुने सिर नवाकर वनके लिये प्रस्थान किया। उस समय महाराज मूर्च्छित हो गये और उन्हें फिर चेतना न हुई, मानो कर्मरूप चोर राजारूप पथिकको मारकर उसका रामरूप रत्न लेकर भाग गया ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, तदनन्तर भानुकुल-भानु भगवान् राम रथपर आरूढ़ हो अति सुहावनी दक्षिणदिशाको चले। उस समय प्रभुका विरहरूप विषम हिम पाकर आयोध्यारूप सरोवरके पुरजनरूप कमल मुरझा गये ॥ ४ ॥ वनके मार्गमें राग बिलावल [ १३ ] कहौँ सो बिपिन हैं धौं केतिक दूरि। जहाँगवनकियो, कुँवरकोसलपति, बूझतिसिय पिय पतिहि बिसूरि ॥१॥
१८५ अयोध्याकाण्ड प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि । करौं बयारि, बिलंबिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ॥२॥ तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि । कानन कहां अबहिं सुनु सुंदरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ॥३॥ (मार्गमें थक जानेसे) श्रीजानकीजी चिन्तित होकर भगवान् रामसे पूछती हैं—'हे कोसलराजकुमार ! आपने जहांके लिये प्रस्थान किया है वह वन यहाँसे कितनी दूर है; ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! आपने सब सुखोंको तृण तोड़कर त्याग दिया (सुखोंसे एकदम सम्बन्ध त्याग कर दिया) और अब परदेशको पैदल ही जा रहे हैं। (आप थक गये होंगे) कुछ देर इस वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये; मैं आपको हवा करूँगी और चरणकमलोंकी धूलि झाड़ूँगी' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, प्रियाके ये वचन सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया; और 'अरि सुन्दरि ! अभी वन कहाँ ;' ऐसा कहकर उनकी ओर अत्यन्त प्रीतिपूर्वक निहारा ॥ ३ ॥ [ १४ ] फिरि फिरि राम सीय तनु हेरत । तृषित जानि जल लेन लषन गए, भुज उठाइ ऊँचे चढ़ि टेरत ॥१॥ अवनि कुरंग, बिहंग द्रुम-डारन रूप निहारत पलक न प्रेरत । मगन न डरत निरखि कर-कमलनि सुभग सरासन सायक फेरत ॥२॥ अवलोकत मग-लोग चहुँ दिसि, मनहु चकोर चंद्रमहि घेरतः । ते जन भूरिभाग भूतलपर तुलसी राम-पथिक-पद जे रत ॥३॥ भगवान् राम मुड़-मुड़कर सीताजीकी ओर देखते हैं। उन्हें प्यासी जानकर लक्ष्मणजी जल लेने गये, तब भगवान् ऊँचे टीलेपर
गीतावली १८६ चढ़कर उन्हें भुजा उठाकर पुकारते हैं ॥ १ ॥ पृथ्वीपर मृग और वृक्षोंकी डालियोंपर पक्षी प्रभुका रूप-लावण्य देख रहे हैं—वे पलक भी नहीं मारते और प्रभुको अपने धनुष-बाणपर कर-कमल फेरते देखकर भी भय नहीं मानते—प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ २ ॥ मार्गमें लोग चारों दिशाओंसे देख रहे हैं, मानो चकोर पक्षी चन्द्रमाको घेरे हुए हों। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग बटोही रामके चरणोंमें रत हैं, वे पृथ्वीपर बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३ ॥ [ १५ ] नृपति-कुंवर राजत मग जात । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मरकत-कनकबर न मृदु गात ॥१॥ अंसनि चाप, तून कटि मुनि पट, जटामुकुट बिच नूतन पात । फेरत पानि सरोजनि सायक, चोरत चितहि सहज मुसुकात ॥२॥ संग नारि सुकुमारि सुभग सुठि, राजति बिन भूषन नव सात । सुखमा निरखि ग्राम-बनितनिके नलिन-नयन बिकसित मनो प्रात ॥३॥ अंग-अंग अगनित अनंग-छबि, उपमा कहत सुकबि सकुचात । सिय समेत नित तुलसिदास चित, बसत किसोर पथिक दोउ भ्रात ॥४॥ मार्गमें जाते हुए राजकुमार बड़े ही शोभायमान हो रहे हैं। उनका सुन्दर मुखमण्डल है, कमलके समान नेत्र हैं तथा मरकतमणि और सुवर्णके-से रंगके मृदुल शरीर हैं ॥ १ ॥ वे कन्धोंपर धनुष रखे हुए हैं, कमरमें तरकस और मुनिजनोचित वस्त्र हैं, सिरपर जटा-जूटका मुकुट है, जिसमें बीच-बीचमें नवीन पत्ते खोंसे हुए हैं। वे धनुषपर अपना करकमल फेर रहे हैं और स्वभावसे मुसकराते ही चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २ ॥ उनके साथमें सोलहों शृङ्गार किये
१८७ अयोध्याकाण्ड बिना ही एक अति सुन्दरी सुकुमारी स्त्री शोभायमान है। उनकी शोभा देखते ही ग्रामीण स्त्रियोंके नेत्रकमल प्रातःकालीन कमलोंके समान खिल उठते हैं॥ ३॥ उनके अङ्ग-अङ्गमें अगणित कामदेवोंकी शोभा है, उसकी उपमा कहनेमें अच्छे-अच्छे कवि भी संकोच मानते हैं। तुलसीदासके हृदयमें तो सीताजीके सहित वे किशोर अवस्थावाले बटोही दोनों भाई सर्वदा विराजमान रहते हैं॥ ४॥ [ १६ ] तू देखि देखि री ! पथिक परम सुंदर दोऊ। मरकत-कलधौत-बरन, काम-कोटि-कांतिहरन, चरन-कमल कोमल अति, राजकुँवर कोऊ ॥ १ ॥ करसर-धनु, कटि निषंग, मुनिपट सोहैं सुभग अंग, संग चंद्रबदनि बधू, सुंदरि सुठि सोऊ। तापस बर बेष किए, सोभा सब लूटि लिए, चितके चोर, बय किसोर, लोचन भरि जोऊ ॥ २ ॥ दिनकर-कुलमनि निहारि प्रेम-मगन ग्राम-नारि, परस्पर कहैं, सखि ! अनुराग ताग पोऊ। तुलसी यह ध्यान-सुधन जानि मानि लाभ सघन, कृपिन ज्यों सनेह सो हिये-सुगेह गोऊ ॥ ३ ॥ [कोई ग्रामीण स्त्री कहती है—] 'अरी सखि ! तू देख तो ये दोनों पथिक बड़े ही सुन्दर हैं। ये मरकत और सुवर्णके समान स्याम एवं गौरवर्ण हैं, करोड़ों कामदेवोंकी कान्तिको हरनेवाले हैं तथा इनके चरण-कमल अत्यन्त कोमल हैं। जान पड़ता है—ये कोई राजकुमार हैं ॥ १ ॥ इनके हाथोंमें धनुष-बाण हैं, कमरमें
गीतावली १८८ तरकस है तथा सुन्दर शरीरमें मुनिजनोचित वस्त्र शोभायमान है। इनके साथ एक चन्द्रमुखी स्त्री है, वह भी बड़ी ही सुन्दरी है। इन्होंने तपस्वियोंका-सा सुन्दर वेष धारणकर मानो सारी शोभा लूट ली है। इस किशोर अवस्थावाले चित्तचोरोंको तनिक नेत्र भरकर देख ले' ॥ २ ॥ तब सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामको देख- कर सब ग्राम-नारियाँ प्रेममें मग्न हो गयीं और आपसमें कहने लगीं— 'अरि सखि ! इन मणियोंको प्रेमरूप तागेमें पिरो लो'। तुलसीदास कहते हैं, इस ध्यानको शुभ धन जानकर और इसे ही बड़ा भारी लाभ समझकर तू कृपणके समान प्रेमपूर्वक अपने हृदयरूप घरमें छिपाकर रख ॥ ३ ॥ [ १७ ] कुँवर साँवरो, री सजनी ! सुंदर सब अंग। रोम रोम छबि निहारि आलि वारि फेरि डारि, कोटि भानु-सुवन सरद-सोम, कोटि अनंग ॥ १ ॥ बाम अंग लसत चाप, मौलि मंजु जटा-कलाप, सुचि सर कर, मुनिपट कटि-तट कसे निषंग। आयत उर-बाहु नैन, मुख-सुखमाको लहै न, उपमा अवलोकि लोक, गिरामति-गति भंग ॥ २ ॥ यों कहि भईं मगन बाल, बिथकीं सुनि जुवति-जाल, चितवत चले जात संग, मधुप-मृग-बिहंग। बरनौं किमि तिनकी दसहि, निगम-अगम प्रेम-रसहि, तुलसी मन-बसन रँगे रुचिर रूपरंग ॥ ३ ॥ 'अरि सखि ! यह साँवला कुमार तो सभी अङ्गोंसे सुन्दर है। अरी आली ! इनकी रोम-रोम की छवि देखकर इनपर करोड़ों
१८६ अयोध्याकाण्ड अश्विनीकुमार, शरद्ऋतुके चन्द्रमा और कामदेव निछावर कर दे॥१॥ इनके वामभागमें धनुष शोभायमान है, सिरपर मनोहर जटाजूट है, हाथमें सुन्दर बाण है तथा कटिप्रदेशमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस कसे हुए हैं। इनके वक्षःस्थल, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं तथा मुखकी शोभा तो कोई भी नहीं पा सकता। संसारमें इनकी उपमा देखते-देखते तो सरस्वतीकी बुद्धिकी भी गति नष्ट हो गयी है'॥२॥ ऐसा कहकर ग्रामकी बालाएँ भगवान्की रूपराशिमें डूब गयीं तथा उनकी बातें सुनकर नवयुवतियाँ थकी-सी रह गयीं। भौंरे, मृग और पक्षिगण तो प्रभुको निहारते हुए उन्हींके संग हो लिये। तुलसीदास कहते हैं, उनके शरीरकी दशा तथा वेदके लिये भी अगम्य प्रेमरसका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके मनरूप वस्त्र प्रभुके अति रुचिर रूप-रंगमें रँग गये ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ १८ ] देखु, कोऊ परम सुंदर सखि ! बटोही । चलत महि मृदु चरन अरुन-बारिज-बरन, भूपसुत रूपनिधि निरखि हौं मोही ॥ १ ॥ अमल मरकत स्याम, सील-सुखमा-धाम, गौरतनु सुभग सोभा सुमुखि जोही । जुगल बिच नारि सुकुमारि सुठि सुंदरी, इंदिरा इंदु-हरि मध्य जनु सोही ॥ २ ॥ करनि बर धनु तीर, रुचिर कटि तूनीर, बीर, सुर-सुखद, मरदन अवनि-द्रोही ।