गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
१. बालकाण्ड: श्रीरामावतार, बाल-लीला एवं धनुर्भंग पद
[ १२ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या जबहि रघुपति सँग सीय चली १८२ तुम्हरे बिरह भई गति जोन.... ३१५ जबतें सिधारे यहि मारग .... २१५ तू देखि देखि री ! पथिक १८७ जननी निरखति बान .... २३३ तू दस कंठ भले कुल जायो .. ३५४ जब-जब भवन बिलोकति सूनो २३५ तें मेरो मरम कछू .... ३५५ जबतें चित्रकूट तें आए .... २५८ तौलौं, मातु ! आपु ३०८ जबहि सिय सुधि सब .... २७८ तौलौं बलि, आपुही .... ४३३ जब रघुबीर पयानो कीन्हों .... ३१७ दीन हित बिरद ३४३ जबतें जानकी रही .... ४३७ दूलह राम, सीय दुलही री ! १६७ जागिये कृपानिधान .... ८० दूर रो न देखतु .... ३२२ जानकी बर सुंदर, माई .... १६६ देखि मुनि ! रावरे पद आज ६२ जानत हौं सबहीके मनकी .... २५१ देखि देखि री! दोउ राजसुवन १३३ जानी है संकर-हनुमान .... २६० देखु, कोक परमसुंदर .. १६६ जाय माय पाँय परि .... ३२३ देखि ! द्वै पथिक गोरे साँवरे १६८ जेहि जेहि मग सिय-राम-लषन २०५ देखु री सखी ! पथिक . २०२ जैसे राम ललित .... ८५ देखत चित्रकूट-बन २२४ जैसे ललित लषन लाल लोने १६८ देखे राम-पथिक नाचत २६७ जो पै हौं मातु मते महं हौं २४३ देखी जानकी जब जाइ .... २६२ जो हौं प्रभु-आयसु लै चलतो ३०७ देखु सखि ! आजु .. ३८८ जो हौं अब अनुसासन पावौं २६१ देखो, राघव-बदन .... ३६८ झूलत राम पालने सोहैं .. ६० देखो रघुपति-छवि ४०८ ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे १८२ देखत अवधको आनन्द .. ४२७ ताते हौं देत न दूषन तोहू .... २४२ दोउ राजसुवन राजत ६६ ता दिन सृंगबेरपुर आए .... २४८ नाहिन भजिबे जोग बियो ... ३४५ तात ! बिचारोधों, हौं क्योंआवौं २५२ नीके कै मैं न विलोकन पाये २०६ तात तोहूसों कहत .... २६६ नीके कै जानत राम हियो हौं २८१
[ १३ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या नृप कर जोरि कह्यो गुर पाहीं १७४ नूपति-कुँवर राजत मग जात १८६ नेकु बिलोकि धौं रघुबरनि ... ६७ नेकु, सुमुखि ! चित लाइ चितौ, री .... १२८ पगनि कब चलिहौ चारौ भैया? ४१ परत पद-पंकज .... १०३ पथिक गौरे-सांवरे सुठि .... १६५ पथिक पयादे जात .... १६६ पदपदुम गरीबनवाजके .... ३२८ पालने रघुपति झुलावै .... ५६ पालत राज यों राजा .... ४२८ पुनि न फिरे सोउ बीर बटाऊ २१० पुत्रि ! न सोचिये ... ४३६ पूजि पारबती भले भाय १२१ पौढ़िये लालम,पालनेहौं झुलावौं ५१ प्रभु सों मैं ढीठो .... २५७ प्रभु कपि-नायक बोलि .... २६० [L
[ १४ ]
| पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| भोर भयो जागेहु रघुनंदन ! | ७७ | मेरो सुनियो, तात ! | .... २८२ |
| भोर फूल बीनबेको | १२० | मेरो सब पुरुपारथ थाको | .˙. ३६० |
| भोर जानकीजीवन जागे | .... ३८२ | मैं तुम्हसों सतिभाव | |
| मंजुल मंगलमय नृप ढोटा | .... १०० | कही है | .... १८१ |
| मंजु मूरति-मंगलमई | .... ३३६ | मोको बिधुबदन | .... १८३ |
| मनमें मंजु मनोरथ हो, री ! | १६५ | मोहि भावति, कहि आवति | .... २६० |
| मनोहरताके मानो ऐन | .... १६५ | मोपै तौ न कछू ह्वै आई | .... ३५६ |
| महाराज राम पहं जाऊँगी | .... ३२६ | या सिसुके गुन नाम बड़ाई | .... ४८ |
| माथे हाथ ऋषि जब दियो | .... ४६ | ये अवधेसके सुत दोऊ | .... १०८ |
| मातु सकल, कुलगुर बधू | .... ४८ | ये दोऊ दसरथके वारे | .... ११४ |
| माई ! मनके मोहन | , १६२ | ये उपही कोउ कुँवर | |
| माई री ! मोहि कोउ | .. २३४ | अहेरी | .... २१६ |
| मातु काहेको कहति | ३०१ | रंग-भूमि भोरे ही जाइकै | .... ११८ |
| मानु अजहू सिख | .... ३५२ | रंगभूमि आये दसरथके | . १२३ |
| मिलो बरु सुंदर | १३२ | रघुबर बाल-छबि कहौं | .... ६५ |
| मुनिके संग बिराजत बीर | ... ६७ | रहे ठगिसे नृपति | .... ६४ |
| मुनि पदरेनु रघुनाथ माथे | , १५० | रहि चलिये सुंदर | |
| मुदित-मन आरती करै माता | १७३ | रघुनायक | .... १७६ |
| मुएहु न मिटैगो मेरो | २३८ | रहहु भवन हमरे कहे | .... १७८ |
| मुनिबर करि छठीं कीन्ही | ... ४४० | रघुपति! मोहि संग किन लीजैं? | २५३ |
| मेरे बालक कैसे धौं मग | .... १५६ | रघुबर दूरि जाइ मृग मारयौ | २७३ |
| मेरे यह अभिलाषु | रजायसु रामको जब पायो | .... २८१ | |
| बिधाता | .... २३६ | रघुपति ! देखो आयो | |
| मेरो अवध धौं कहहु, कहा हैं | २४४ | हनुमंत | ३१० |
| मेरे एको हाथ न लागी | .... २७६ | रघुकुलतिलक ! बियोग | |
| मेरे जान तात ! कछू | .... २८१ | तिहारे | .... ३१३ |
[ १५ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या | पद-सूचना पृष्ठ-संख्या रन जीति रामराउ आए ३७७ | राम राजराजमौलि .... ३६३ रघुपति राजीवनयन .... ३८३ | रामचंद्र-करकंज कामतरु .... ४०४ रघुवर-रूप बिलोकु नेकु | राम-चरन अभिराम मन ... ४०६ | कामप्रद .... ४०५ रघुनाथ तुम्हारे चरित .... ४४२ | राम विचारि कै राखी .... ४३० राम-सिसु गोद महामोद .... ४३ | रीति चलिबेकी चाहि .... २०४ राजत सिसुरूप राम .... ६१ | ललन लोने लेरुआ बलि मैया ५३ राम लषन इक ओर .... ८८ | ललित सुतहि लालति सचु पाये ८२ राजन् ! राम-लषन जो दीजै ६३ | ललित ललित लघु-लघु .... ८६ रामपद-पदुम-पराग परी .... १०२ | लाज तोरि, साजि साज .... १५३ राम-लषन जब दृष्टि परे री ! १२७ | लेहु री लोचननिको लाहु .... १५७ रामहि नीके कै निरख
[ १६ ] पद-सूचना पृष्ठ-संख्या पद-सूचना पृष्ठ-संख्या सखि ! रघुवीर मुखछबि सुनु खल ! मैं तोहि बहुत .... ५५७ देखु .... ३९७ सुनि हनुमंत बचन रघुबीर ... ३६२ साँचेहु बिभीषन आइहै ! .... ३३२ सुनि रन घायल .... ३६७ साँझ समय रघुबीर पुरी की.... ४२० सुनियत सागरसेतु बंधायो .... ३७५ सादर सुमुखि बिलोकि .... ७५ सुमिरत श्रीरघुबीरकी बाँहैं.... ४०२ सानुज भरत भवन उठि धाए १६२ सुनि ब्याकुल भए .... ४३४ सिरिस-सुमन सुकुमारि .... २०७ सुभ दिन सुभ घरी .... ४३८ सिय ! धीरज धरिये .... ३५० सोइये लाल लाड़िले सीय ! स्वयंबरु, माई ... १२६ रघुराई .... ५२ सुभग सेज सोभित कौसिल्या ३६ सोहत सहज सुहाये नैन .... ७७ सुखनींद कहति आलि आइहौं ५४ सोहत मग मुनि संग .... ६८ सुनु सखि भूपति .... १२६ सोचत जनक पोंच पेच .... १३९ सुजन सराहँ जो .... १४१ सोहैं साँवरे पथिक .... १६४ सुनो भैया भूप सकल .... १४४ सो दिन सोनेको .... ३३६ सुनहु राम मेरे प्रानपियारे ... १७५ हाथ मीजिबो हाथ रह्यो .... २५२ सुन्यो जब फिरि सुमंत .... २३७ हिय बिहसि कहत .... ३३१ सुकसों गहबर हिये .... २४६ हृदय घाउ मेरे .... ३६९ सुनी मैं, सखि मंगल .... २६६ हेमको हरिन हनि .... २७५ सुभग सरासन सायक जोरें .... २६८ ह्वै हौ लाल कबँहि बड़े .... ४० सुमन समीरको धीर धुरीन.... २९६ हो तो नहि जी जग .... ३६६ सुनहु राम विश्रामधाम .... ३३२ हौं तो समुझि रही .... २६३ सुजन सुनि श्रवन .... ३४१ हौं रघुबंसमनि को दूत .... २६८ ──★──
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श्रीश्रीसीताराम
ॐ श्रीसीतारामभ्यां नमः गीतावली बालकाण्ड बधाई राग आसावरी [ १ ] आजु सुदिन सुभ घरी सुहाई। रूप-सील-गुन-धाम राम नृप-भवन प्रगट भए आई॥ १ ॥ श्रति पुनीत मधुमास, लगन-ग्रह-बार-जोग-समुदाई। हरषवन्त चर-अचर, भूमिसुर-तनरुह पुलक जनाई॥ २ ॥ बरषहिं बिबुध-निकर कुसुमावलि, नभ दुन्दुभी बजाई। कौसल्यादि मातु मन हरषित, यह सुख बरनि न जाई॥ ३ ॥ सुनि दसरथ सुत-जनम लिए सब गुरुजन बिप्र बोलाई। बेद-बिहित करि क्रिया परम सुचि, आनँद उर न समाई॥ ४ ॥ सदन बेद-धुनि करत मधुर मुनि, बहु बिधि बाज बधाई। पुरबासिन्ह प्रिय-नाथ-हेतु निज निज सम्पदा लुटाई॥ ५ ॥ मनि तोरन, बहु केतुपताकनि, पुरी रुचिर करि छाई। मागध-सूत द्वार बन्दीजन जहँ तहँ करत बड़ाई॥ ६ ॥ सहज सिङ्गार किए बनिता चली मङ्गल बिपुल बनाई। गावहिं देहिं असीस मुदित, चिर जिवौ तनय सुखदाई॥ ७ ॥ बीथिन्ह कुंकुम-कीच, अरगजा अगर अबीर उड़ाई। नाचहिं पुर-नर-नारि प्रेम भरि देहदसा बिसराई॥ ८ ॥ गी० २—
गीतावली १८ अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरूप अधिकाई । देत भूप अनुरूप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ॥ ९ ॥ सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई । सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ॥ १० ॥ जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई । सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौँ गाई ॥ ११ ॥ जे रघुवीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई । अबिरल अमल अनूप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ॥ १२ ॥ आज बड़ा मङ्गलमय दिन है, आजकी शुभ घड़ी बड़ी सुहावनी है। आज सौन्दर्य, शील और गुणके आगार भगवान् राम महाराज दशरथके भवनमें प्रकट हुए हैं ॥ १ ॥ अति पवित्र चैत्रमास है तथा लग्न; ग्रह, वार और योग, इन सबका समुदाय भी परम पावन है। चराचर प्राणी बड़े हर्षयुक्त हैं तथा ब्राह्मणोंके शरीरोंमें रोमाञ्च हो रहा है ॥ २ ॥ देववृन्द आकाशमें दुन्दुभी बजाते हुए पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं तथा कौसल्या आदि माताओंका मन बड़ा ही हर्षित हो रहा है। हमसे इस सुखका वर्णन नहीं हो पाता ॥ ३ ॥ दशरथ- जीने पुत्रका जन्म होना सुनकर समस्त गुरुजन और विप्रवृन्दको बुला लिया है और बड़ी पवित्रतासे सम्पूर्ण वेद विहित क्रियाएँ की हैं। इस समय उनके हृदयमें आनन्द अँटता नहीं है ॥ ४ ॥ महलमें मुनि सुमधुर वेदध्वनि कर रहे हैं तथा तरह-तरहकी बधाइयाँ बज रही हैं। पुरवासियोंने भी अपने परम प्रिय नाथके लिये अपनी-अपनी सम्पत्ति लुटा दी है ॥ ५ ॥ मणियोंका तोरण और बहुत-सी ध्वजा- पताकाओंसे पुरीको बड़ी सुन्दरतासे छा दिया है। द्वारपर जहाँ-तहाँ मागध, सूत और बन्दीजन बड़ाई कर रहे हैं ॥ ६ ॥ पुरनारियाँ अपना
१९ बालकाण्ड स्वाभाविक शृङ्गार किये तरह-तरहकी मङ्गलसामग्री लिए चली आ रही हैं। वे गाती हैं और प्रसन्न चित्तसे आशीर्वाद देती हैं कि यह सुखदायक बालक चिरजीवी हों ॥ ७॥ गलियोंमें केसरकी कीच मच रही है तथा अरगजा, अगर और अबीर उड़ रहा है। पुरके नर- नारी प्रेममें भरकर नाच रहे हैं और उन्होंने अपने शरीरकी सुधभी भुला दी है ॥ ८ ॥ महाराज दशरथ अगणित वस्त्र, हाथी, घोड़े, गौ, मणि और सुवर्ण आदि अधिक परिमाणमें दे रहे हैं। जिसके लिए जो चीज उचित है, उसे वही दान कर रहे हैं। इस समय सारी सिद्धियाँ उनके घर-आ गयी हैं ॥ ९ ॥ इस समय देवता, साधुजन और ब्राह्मण तो प्रसन्न हो रहे हैं, किन्तु दुष्टोंका मन मलिन है; जिस प्रकार सूर्योदय होनेपर सभी पुष्प खिल जाते हैं किन्तु कुमुदवन मुरझा जाता है ॥१०॥ जिस आनन्द-समुद्रकी एक बूंदसे ही शिवजी और ब्रह्माजीका जगत्में प्रभुत्व है, वही सुखसागर इस समय अवधपुरीमें दसों दिशाओंमें उमड़ रहा है। उसका वर्णन मैं किस प्रकार गाकर करूँ ? ॥ ११ ॥ जो श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंका चिन्तन करनेवाले हैं यहाँ उनकी गति स्पष्ट दिखायी पड़ रही है। हे प्रभो! तुलसीदासने भी आपकी अविरल, अमल और अनुपम सुदृढ़ भक्ति प्राप्त की है ॥ १२ ॥ राग जैतश्री [ २ ] सहेली सुनु सोहिलो रे ! सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो, सोहिलो सब जग आज । पूत सपूत कोसिला जायो, अचल भयो कुल-राज ॥ १ ॥
गीतावली २०
चैत चारु नौमी तिथि सितपख, मध्य-गगन-गत भानु । नखत जोग ग्रह लगन भले दिन मङ्गल-मोद-निधान ॥ २ ॥ व्योम, पवन, पावक, जल, थल, दिसि दसहु सुमङ्गल-मूल । सुर दुन्दुभी बजावहिं, गावहिं, हरषहिं, बरषहिं फूल ॥ ३ ॥ भूपति-सदन सोहिलो सुनि बाजैं गहगहे निसान । जहँ-तहँ सर्जाहिं कलस धुज चामर तोरन केतु बितान ॥ ४ ॥ सींचि सुगन्ध रचैं चौकें गृह-आँगन गली-बजार । दल फल फूल दूध दधि रोचन, घर घर मङ्गलाचार ॥ ५ ॥ सुनि सानन्द उठे दसस्यन्दन सकल समाज समेत । लिए बोलि गुर-सचिव-भूमिसुर, प्रमुदित चले निकेत ॥ ६ ॥ जातकरम करि, पूजि पितर-सुर, दिए महिदेवन दान । तेहि औसर सुत तीनि प्रगट भए मङ्गल, मुद, कल्यान ॥ ७ ॥ आनँद महँ आनन्द अवध, आनन्द बधावन होइ । उपमा कहौं चारि फलकी, मोहिं भलो न कहैं कबि कोइ ॥ ८ ॥ सजि आरती बिचित्र थार कर जूथ जूथ बरनारि । गावत चलीं बधावन लै लै निज निज कुल अनुहारि ॥ ६ ॥ असही दुसही मरहु मनहि मन, बैरिन बढ़हु बिषाद । नृपसुत चारि चारु चिरजीवहु सङ्कर-गौरि-प्रसाद ॥ १० ॥ लै लै ढोव प्रजा प्रमुदित चले भाँति भाँति भरि भार । करहिं गान करि आन रायकी, नाचहिं राज दुवार ॥ ११ ॥ गज, रथ, बाजि, बाहिनी, बाहन सबनि सँवारे साज । जनु रतिपति ऋतुपति कोसलपुर बिहरत सहित समाज ॥ १२ ॥ घण्टा-घण्टि, पखाउज-आउज, झाँझ, बेनु डफ-तार । नूपुर धुनि, मञ्जीर मनोहर, कर कङ्कन-झनकार ॥ १३ ॥
२१ बालकाण्ड नृत्य करहिं नट-नटी, नारि-नर अपने-अपने रङ्ग। मनहुँ मदन-रति बिबिध बेष धरि नटत सुदेस सुढङ्ग ॥ १४ ॥ उघटहिं छन्द-प्रबन्ध, गीत-पद, राग-तान-बन्धान। सुनि किंनर गन्धरब सराहत, बिथके हैं बिबुध बिमान ॥ १५ ॥ कुंकुम-अगर-अरगजा छिरकहिं, भरहिं गुलाल अबीर। नभ प्रसून झरि, पुरी कोलाहल, भइ मन भावति भीर ॥ १६ ॥ बड़ी बयस बिधि भयो दाहिनो सुर-गुर-आसिरबाद। दसरथ-सुकृत-सुधासागर सब उमगे हैं तजि मरजाद ॥ १७ ॥ ब्राह्मण बेद, बन्दि बिरदावलि, जय-धुनि, मङ्गल-गान। निकसत पैठत लोग परस्पर बोलत लगि लगि कान ॥ १८ ॥ बारहिं मुकुता-रतन राजमहिषी पुर-सुमुखि समान। बगरे नगर निछावरि मनिगन जनु जुवारि-जव-धान ॥ १६ ॥ कीन्हि बेदबिधि लोकरीति नृप, मन्दिर परम हुलास। कौसल्या, कैकयी, सुमित्रा, रहस बिबस रनिवास ॥ २० ॥ रानिन दिये बसन-मनि-भूषन, राजा सहन-भँडार। मागध-सूत-भाट-नट-जाचक जहँ तहँ करहिं कबार ॥ २१ ॥ बिप्रबधू सनमानि सुआसिनि, जन-पुरजन पहिराइ। सनमाने अवनीस, असीसत ईस-रमेस मनाइ ॥ २२ ॥ अष्टसिद्धि, नवनिद्धि, भूति सब भूपति भवन कमाहिं। समउ-समाज राज दसरथको लोकप सकल सिहाहिं ॥ २३ ॥ को कहि सकै अवधवासिनको प्रेम-प्रमोद-उछाह। सारद सेस-गनेस-गिरीसहिं अगम निगम अवगाह ॥ २४ ॥ सिव-बिरंचि-मुनि-सिद्ध प्रसंसत, बड़े भूप के भाग। तुलसिदास प्रभु सोहिलो गावत उमगि-उमगि अनुराग ॥ २५ ॥
गीतावली २२ अरी सखी ! सोहिला (बधाईके गीत) तो सुन । अहा ! आज सारे जगत्में सोहिला-ही-सोहिला हो रहा है । आज कौसल्याने एक सपूत बालकको जन्म दिया है, जिससे उसका कुख और राज अविचल हो गया है ॥ १ ॥ आज चैत्र शुक्ला नवमी तिथि है, सूर्यदेव मध्य आकाशमें प्रकाशमान हो रहे हैं, आजके शुभ दिनमें नक्षत्र, योग, ग्रह और लग्न सभी अच्छे हैं और आजका दिन मङ्गल और मोदका घर है ॥ २ ॥ आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और दसों दिशाएँ मङ्गलमूल हो रही हैं तथा सुरगण दुन्दुभी बजाकर गाते और प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करते हैं ॥ ३ ॥ महाराज दशरथके घर सोहिला होता सुन सब ओर नक्कारोंकी गम्भीर ध्वनि होने लगी है तथा जहाँ.तहाँ कलश, ध्वजा, चँवर, तोरण, पताका और मण्डप सजाये जा रहे हैं ॥४॥ घर, आँगन, गली और बाजारोंको सुगन्धित जलसे सींचकर उनमें चौक पूरे जा रहे हैं तथा घर-घरमें पत्र, पुष्प, फल, दूब, दही और रोली आदि सामग्रियोंसे मङ्गलाचार हो रहा है ॥ ५ ॥ पुत्र-जन्मका समाचार सुन महाराज दशरथ सम्पूर्ण राजदरबारके सहित उठ खड़े हुए और गुरु, मन्त्री एवं ब्राह्मणोंको बुलाकर प्रसन्नतापूर्वक महलकी ओर चल पड़े ॥६॥ वहाँ पुत्रका जातकर्म-संस्कार कर पितृगण और देवताओंकी पूजा की तथा ब्राह्मणोंको दान दिया । इसी समय उनके मङ्गल, आनन्द और कल्याणस्वरूप तीन पुत्र और उत्पन्न हुए ॥ ७ ॥ आज अयोध्यामें आनन्दमें आनन्द हो गया और चारों तरफ आनन्दका ही बधावा हो रहा है । यदि मैं उन्हें [अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप] चार फलोंकी उपमा दूँ तो मुझे कोई कवि भला नहीं कहेगा । [क्योंकि चार
२३ बालकाण्ड फलोंमें सर्वश्रेष्ठ मोक्ष कहा गया है। यदि किसीको पहले ही मोक्ष मिल जाय तो अर्थादि तीनों फलोंकी पीछेसे प्राप्ति उसके लिये अनावश्यक होगी। यहाँ मोक्षस्वरूप श्रीरामजीका जन्म प्रथम ही हो चुका है। यदि अर्थ, धर्म पहले सङ्ग रहें, काम, मोक्ष पीछे प्राप्त हों तो क्रम ठीक होगा। जैसे शत्रुघ्न, भरत राजाके साथ अयोध्यासे मिथिला बारातमें गये और लक्ष्मण, श्रीरामजी वहाँ मिले, तब वहाँ चारों फलकी उपमा देना बन गया है—‘नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी ॥’ तथा ‘जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि ॥’ इत्यादि ] ॥८॥ झुण्ड-की-झुण्ड स्त्रियाँ विचित्र थालोंमें आरती सजाकर अपने-अपने कुलके अनुसार बधावा लेकर गाती हुई चलीं ॥९॥ [और बालकको ऐसा आशीर्वाद देने लगीं कि] इन बालकोंकी उन्नतिको सहन न करनेवाले तथा इनसे द्वेष माननेवाले लोग मन-ही-मन मर जायँ और इनके वैरियोंके विषाद- की वृद्धि हो तथा श्रीशङ्कर और पार्वतीजीकी कृपासे ये चारों ही सुन्दर राजकुमार दीर्घजीवी हों ॥१०॥ प्रजाजन प्रसन्न हों, भाँति- भाँतिके उपहारोंके भार लेकर चले और राजभवनके द्वारपर आकर महाराजकी दुहाई देते हुए नाचने और गाने लगे ॥११॥ हाथी, रथ और घुड़सवार-सेनाने अपने-अपने वाहन और साजोंको सजाया, मानो इस समय रतिराज (कामदेव) और ऋतुराज (वसन्त) अपने समाजसहित कोसलपुरमें विहार कर रहे हैं ॥१२॥ घण्टा, घण्टी और पखावजों तथा तासोंका शब्द हो रहा है; झाँझ, बाँसुरी, डफ और करताल बज रहा है तथा नूपुर और मंजीरोंकी मनोहर ध्वनि और हाथोंके कङ्कणोंकी झङ्कार हो रही है ॥१६॥ नट-नटी, नर-नारी
गीतावली २४ अपने-अपने रंगमें भरकर नृत्य कर रहे हैं, मानो कामदेव और रति तरह-तरहके रूप धारणकर सुन्दर ढंगसे सुन्दर नाच नाच रहे हों ॥१४॥ नाना प्रकारके छन्द, प्रबन्ध, गीत, पद, राग और तानके क्रमोंका उद्घाटन हो रहा है, जिसे सुनकर गन्धर्व और किन्नरगण प्रशंसा कर रहे हैं तथा देवताओंके विमान भी थकित हो रहे हैं ॥१५॥ केसर, अगर और अरगजा छिड़कते हैं तथा गुलाल और अबीर लगाते हैं, आकाशसे फूलोंकी झड़ी लगी है तथा नगरमें बड़ा कोलाहल और सुन्दर भीड़ हो रही है ॥१६॥ महाराज दशरथको गुरु और देवताओंके आशीर्वादसे वृद्धावस्थामें विधाता अनुकूल हुआ है। इस समय दशरथजीके सम्पूर्ण सुकृतरूप अमृतसमुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर उमड़ आये हैं ॥१७॥ ब्राह्मणलोग वेदध्वनि तथा बन्दीलोग विरदावली, जयघोष और मङ्गलगान कर रहे हैं। अतः कामकाजी लोग बाहर-भीतर आते-जाते समय [कोलाहलके कारण एक दूसरेका शब्द न सुन सकनेसे] आपसमें कानसे लगकर बात- चीत करते हैं ॥१८॥ राजमहिषी और नगरकी नारियाँ समान- भावसे मोती और रत्न आदि निछावर कर रही हैं। सारे नगरमें निछावर किये गये मणिगण बिखरे हुए हैं, मानो ज्वार, जौ और धान बिखरे पड़े हैं ॥१९॥ महाराजने परम आनन्दित होकर राजभवनमें सब प्रकारकी वैदिक और लौकिक रीति की है। इस समय कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा तथा सारा रनिवास अति हर्षित हो रहा है ॥२०॥ रानियोंने वस्त्र, मणि और आभूषणादि दिये हैं तथा राजाने [रुपया, अशरफी आदि] बाहरी कोष दान किया है। उन्हें लेकर मागध, सूत, भाट, नट और याचकलोग आपसमें जहाँ
२५ बालकाण्ड
तहाँ लेन-देन कर रहे हैं ॥२१॥ महाराजने विप्रवधू और सुवासिनियों- (पितृगृहमें रहनेवाली विवाहिता लड़कियों) का सम्मान कर अपने आश्रित और पुरवासियोंको वस्त्रादि पहनाकर सम्मानित किया है। अतः वे सब लोग महादेव और विष्णुभगवान्को मनाते हुए उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं ॥२२॥ इस समय आठों सिद्धियाँ, नवों निधियाँ और सब प्रकारकी विभूतियाँ महाराजके महलमें टहल कर रही हैं। महाराज दशरथके इस समय और समाजको देखकर सभी लोकपाल सिहा रहे हैं ॥२३॥ अवधवासियोंके इस समयके प्रेम, प्रमोद और उत्साहका वर्णन कौन कर सकता है ? वह शारदा, शेष, गणेश और भगवान् शङ्करकी भी पहुँचके बाहर है और वेद भी उसका पार नहीं पा सकते ॥२४॥ महाराज दशरथके सौभाग्यकी शिवु, ब्रह्मा, मुनि और सिद्धगण भी प्रशंसा कर रहे हैं। इस समय तुलसीदास भी प्रेमसे- उमँग-उमँगकर प्रभुका सोहिला गा रहा है ॥२५॥
राग बिलावल [ ३ ] आजु महामङ्गल कोसलपुर सुनि नृपके सुत चारि भए । सदन-सदन सोहिलो सोहावनो, नभ अरु नगर निसान हए ॥ १ ॥ सजि-सजि जान अमर-किंनर-मुनि जानि समय सम गान ठए । नाचहिं नभ अपसरा मुदित मन, पुनि-पुनि बरषहिं सुमन-चए ॥ २ ॥ अति सुख बेगि बोलि गुरु भूसुर भूपति भीतर भवन गये । जातकर्म करि कनक, बसन, मनि भूषित सुरभि-समूह दए ॥ ३ ॥ दल-फल-फूल, दूब-दधि-रोचन, जुवतिन्ह भरि-भरि थार लए । गावत चलीं भीर भइ बीथिन्ह, बन्दिन्ह बाँकुरे बिरद बए ॥ ४ ॥
गीतावली २६ कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहाँ-तहँ बन्दनवार नए । भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं सकल लोक एक रङ्ग रए ॥ ५ ॥ उमगि चल्यौ आनन्द लोकतिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए । तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए ॥ ६ ॥ महाराज दशरथके चार पुत्र हुए सुनकर आज कोसलपुरमें अत्यन्त मङ्गल हो रहा है । घर-घरमें सुहावना सोहिला हो रहा है तथा आकाश और नगरमें नगाड़े बजाये जा रहे हैं ॥१॥ भगवान्का जन्म जानकर देवता, किन्नर और मुनिजन अपने-अपने यान सजा- कर आये हैं तथा गन्धर्वोंने समयानुकूल गान आरम्भ कर दिया है । आकाशमें अप्सराएँ प्रसन्नचित्तसे नृत्य कर रही हैं और बारम्बार सुमनसमूह बरसाती हैं ॥२॥ महाराज परम आनन्दसे गुरुजी तथा अन्य ब्राह्मणोंको बुलाकर [उन्हें अपने साथ ले] महलके भीतर गये और बालकोंका जातकर्म संस्कार कर उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, मणि और सजी हुई गौवोंके समूह दान किये ॥३॥ युवतियोंने थाल भर-भरकर पत्र, फूल, नारियल आदि माङ्गलिक फल, दूब, दही और रोरीलीं और गान करती हुई राजमन्दिरकी ओर चलीं, इससे गलियोंमें भीड़ हो गयी है तथा बन्दीजन महाराजके वंशका अनोखा यश गा रहे हैं ॥४॥ जहाँ-तहाँ सुवर्णमय कलश, चँवर, पताका, ध्वजा और नयी-नयी बन्दनवारें बाँधी गयी हैं । सभी लोग एक ही रङ्गमें रँगकर परस्पर अबीर उड़ाते अरगजा छिड़कते हैं ॥५॥ तीनों लोकोंमें आनन्द उमड़ चला है तथा सभी लोग [निछावर कर-करके] अपने घरोंको खाली किये देते हैं, किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीके कृपादृष्टिसे निहारते ही वे सब पुनः ज्यों-के-त्यों भरे हुए ही दिखायी देते हैं ॥६॥
२७ बालकाण्ड राग जैतश्री [ ४ ] गावैं बिबुध बिमल बर बानी। भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ॥ १ ॥ मास, पाख, तिथि, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी। जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ॥ २ ॥ बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी। ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद-रजधानी ॥ ३ ॥ अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगत बिषाद गलानी। मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ॥ ४ ॥ देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी। मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ॥ ५ ॥ पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी। 'ज्यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी' ॥ ६ ॥ दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी। भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ॥ ७ ॥ गावत-नाचत, जो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी। देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ॥ ८ ॥ गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी। हरि-बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ॥ ६ ॥ आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी। आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ॥ १० ॥ बिभव-बिलास बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी। कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ॥ ११ ॥
गीतावली २८ छठी-बारहौं लोक-वेद-बिधि करि सुबिधान बिधानी । राम-लषन-रिपुदवन-भरत धरे नाम ललित गुरग्यानी ॥ १२ ॥ सुकृत-सुमन तिल-मोद बासि बिधि जतन-जन्त्र भरि घानी । सुख-सनेह सब दिये दसरथहि खरि खलेल-थिर थानी ॥ १३ ॥ अनुदिन उदय-उछाह, उमग जग, घर-घर अवध कहानी । तुलसी राम-जनम-जस गावत सो समाज उर आनी ॥ १४ ॥ देवतालोग अति विशुद्ध और सुन्दर वाणीमें गाते हैं—महारानी कौसल्याने जो पुत्र उत्पन्न किया है, वह करोड़ों भुवनोंके कल्याणका मूल ही है ॥१॥ मास, पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र, ग्रह, योग और लग्न सभी बहुत शुभ आ बने हैं । जल, थल, आकाश और साधुओंके हृदय प्रसन्न हैं तथा दसों दिशाओंमें उल्लास भरा हुआ है ॥२॥ पुष्पोंकी वर्षा हो रही है तथा आकाश और नगरमें बधावा हो रहा है । इस समयका हर्ष कहा नहीं जाता । जैसा आनन्द रनिवास और महाराजको है वैसा ही सारे देश और राजधानीको भी है ॥३॥ देवता, नाग, मुनि, मनुष्य और परिजन सभी विषादऔरग्लानिसे रहित होगये हैं तथा इसके साथ ही रावण और राक्षसोंके सहित सम्पूर्ण लङ्कापुरी शङ्कितहोकरव्याकुल हो रही है ॥४॥ महाराजने देवता, पितर, गुरु और ब्राह्मणोंका पूजन कर तथा उनकी रुचि जानकर दान दिये हैं । मुनि- पत्नियों, पुरनारियों और सुवासिनियोंका हजारों प्रकारसे सम्मानकिया है ॥५॥ याचकलोग भरपूर द्रव्य पाकर दानी हो गये हैं, वेद्वारसे निकलते हुए आशीर्वाद देते हैं कि कैकेयी और सुमित्रापर भी भगवान् शङ्कर और पार्वतीजी इस प्रकार प्रसन्न हों ॥६॥ इसके दूसरे ही दिन वे दोनों राजरानियाँ भी [भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्नजीके जन्म लेनेसे
२६ बालकाण्ड मङ्गलकी खानि हो गयीं। इस प्रकार सोहिलेमें सोहिला हो रहा है, मानो सारी सृष्टि ही सोहिलेमें सनी हुई है ॥७॥ सब लोग नाच-गा रहे हैं, यह मेरे मन को भाता है, सुखसे अयोध्याकी शोभा और बढ़ गयी है। सम्पूर्ण प्रजा आनन्दमें अघाकर लोगोंको (उपहार) देती और स्वयं लेती है, लोग स्वयं वस्त्राभूषण पहनते हैं और दूसरोंको पहनाते हैं ॥८॥ गान तथा बाजोंके शोरका कुतूहल देखकर सारी दुनिया सिहा रही है। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजीकी पुरियोंकी भी सारी शोभा कोसलपुरीपर लुब्ध हो रही है ॥९॥ सब राजमहिलाएँ अति आनन्दित हैं, क्योंकि (पति- सुखसे] उनकी माँग और [पुत्रजन्मसे] कोख धन्य हो गयी है। पार्वतीजी, लक्ष्मीजी और ब्रह्माणी भी आशीर्वादि देती हुई आदरपूर्वक उनके भाग्यकी प्रशंसा कर रही हैं ॥१०॥ महाराज दशरथके वैभव और विलासकी वृद्धि देखकर जिन्हें अच्छी नहीं लगी उनपर कीर्ति, कुशल, वैभव और ऋद्धि-सिद्धि सभी कुपित हो गयीं ॥११॥ विधिवेत्ता वसिष्ठजीने लोक और वेदकी विधिसे सब विधान करते हुए छठी- बरहीकी और उन ज्ञानी गुरुदेवने उन बालकोंके राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत—ये अति सुन्दर नाम रखे ॥१२॥ इस समय विधाताने मोदरूपी तिलोंको सुकृत ( पुण्य ) रूप पुष्पोंकी गन्धमें बसाकर उन्हें यत्नरूप यन्त्रोंमें पेरकर उनसे निकला हुआ सुखरूप स्नेह तो दशरथजीको दिया है तथा [ सांसारिक सुखरूप ] खली और मैल दिक्पालोंको दिये हैं ॥१३॥ प्रतिदिन सम्पूर्ण जगत्में भगवान्के