गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १८ अमित धेनु-गज-तुरग-बसन-मनि, जातरूप अधिकाई । देत भूप अनुरूप जाहि जोइ, सकल सिद्धि गृह आई ॥ ९ ॥ सुखी भए सुर-सन्त-भूमिसुर, खलगन-मन मलिनाई । सबै सुमन बिकसत रबि निकसत, कुमुद-बिपिन बिलखाई ॥ १० ॥ जो सुखसिन्धु-सकृत-सीकर तें सिव-बिरञ्चि-प्रभुताई । सोइ सुख अवध उमँगि रह्यो दस दिसि, कौन जतन कहौँ गाई ॥ ११ ॥ जे रघुवीर-चरन-चिन्तक, तिन्हकी गति प्रगट दिखाई । अबिरल अमल अनूप भगति दृढ़ तुलसिदास तब पाई ॥ १२ ॥ आज बड़ा मङ्गलमय दिन है, आजकी शुभ घड़ी बड़ी सुहावनी है। आज सौन्दर्य, शील और गुणके आगार भगवान् राम महाराज दशरथके भवनमें प्रकट हुए हैं ॥ १ ॥ अति पवित्र चैत्रमास है तथा लग्न; ग्रह, वार और योग, इन सबका समुदाय भी परम पावन है। चराचर प्राणी बड़े हर्षयुक्त हैं तथा ब्राह्मणोंके शरीरोंमें रोमाञ्च हो रहा है ॥ २ ॥ देववृन्द आकाशमें दुन्दुभी बजाते हुए पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं तथा कौसल्या आदि माताओंका मन बड़ा ही हर्षित हो रहा है। हमसे इस सुखका वर्णन नहीं हो पाता ॥ ३ ॥ दशरथ- जीने पुत्रका जन्म होना सुनकर समस्त गुरुजन और विप्रवृन्दको बुला लिया है और बड़ी पवित्रतासे सम्पूर्ण वेद विहित क्रियाएँ की हैं। इस समय उनके हृदयमें आनन्द अँटता नहीं है ॥ ४ ॥ महलमें मुनि सुमधुर वेदध्वनि कर रहे हैं तथा तरह-तरहकी बधाइयाँ बज रही हैं। पुरवासियोंने भी अपने परम प्रिय नाथके लिये अपनी-अपनी सम्पत्ति लुटा दी है ॥ ५ ॥ मणियोंका तोरण और बहुत-सी ध्वजा- पताकाओंसे पुरीको बड़ी सुन्दरतासे छा दिया है। द्वारपर जहाँ-तहाँ मागध, सूत और बन्दीजन बड़ाई कर रहे हैं ॥ ६ ॥ पुरनारियाँ अपना