भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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गीतावली २६ कनक-कलस, चामर-पताक-धुज, जहाँ-तहँ बन्दनवार नए । भरहिं अबीर, अरगजा छिरकहिं सकल लोक एक रङ्ग रए ॥ ५ ॥ उमगि चल्यौ आनन्द लोकतिहुँ, देत सबनि मन्दिर रितए । तुलसिदास पुनि भरेइ देखियत, रामकृपा चितवनि चितए ॥ ६ ॥ महाराज दशरथके चार पुत्र हुए सुनकर आज कोसलपुरमें अत्यन्त मङ्गल हो रहा है । घर-घरमें सुहावना सोहिला हो रहा है तथा आकाश और नगरमें नगाड़े बजाये जा रहे हैं ॥१॥ भगवान्‌का जन्म जानकर देवता, किन्नर और मुनिजन अपने-अपने यान सजा- कर आये हैं तथा गन्धर्वोंने समयानुकूल गान आरम्भ कर दिया है । आकाशमें अप्सराएँ प्रसन्नचित्तसे नृत्य कर रही हैं और बारम्बार सुमनसमूह बरसाती हैं ॥२॥ महाराज परम आनन्दसे गुरुजी तथा अन्य ब्राह्मणोंको बुलाकर [उन्हें अपने साथ ले] महलके भीतर गये और बालकोंका जातकर्म संस्कार कर उन्हें सुवर्ण, वस्त्र, मणि और सजी हुई गौवोंके समूह दान किये ॥३॥ युवतियोंने थाल भर-भरकर पत्र, फूल, नारियल आदि माङ्गलिक फल, दूब, दही और रोरीलीं और गान करती हुई राजमन्दिरकी ओर चलीं, इससे गलियोंमें भीड़ हो गयी है तथा बन्दीजन महाराजके वंशका अनोखा यश गा रहे हैं ॥४॥ जहाँ-तहाँ सुवर्णमय कलश, चँवर, पताका, ध्वजा और नयी-नयी बन्दनवारें बाँधी गयी हैं । सभी लोग एक ही रङ्गमें रँगकर परस्पर अबीर उड़ाते अरगजा छिड़कते हैं ॥५॥ तीनों लोकोंमें आनन्द उमड़ चला है तथा सभी लोग [निछावर कर-करके] अपने घरोंको खाली किये देते हैं, किन्तु तुलसीदासजी कहते हैं कि रघुनाथजीके कृपादृष्टिसे निहारते ही वे सब पुनः ज्यों-के-त्यों भरे हुए ही दिखायी देते हैं ॥६॥