गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७७ अयोध्याकाण्ड लिये माता भी तो माननीया है ॥ १॥ तुम्हारा यह स्वभाव तो वेदमें भी विख्यात है कि रघुनाथजी सर्वदा सत्पुरुषोंको सुख देनेवाले हैं। अतः मैं बलिहारी जाऊँ, तुम अपनी वेदोक्त मर्यादाकी रक्षा करो और धनुष-बाण उतारकर रख दो ॥ २ ॥ रामके वनगमनका समाचार पाते ही सारा नगर शोककूपमें डूब जायगा और महाराज भी प्राण छोड़ देंगे। अरे, रामचरणोंसे बिछोह करानेवाले विधाता ! देख, यह दोष अब तेरे ऊपर आनेवाला है ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, माताके ये वचन सुनकर प्रभु नेत्रोंसे जल बहाने लगे, मानो कुछ तो यह नर-देह पानेका स्वभाव था और कुछ यह विचार भी था कि यदि मैंने देवताओंका कार्य पूर्ण न किया तो मुझे पृथ्वीमें आनेका दोष ही लगेगा ॥ ४ ॥ राग सोरठ [ ४ ] राम ! हौं कौन जतन घर रहिहौं ? बार बार भरि अंक गोद लै ललन कौनसों कहिहौं ॥ १ ॥ इहि आँगन बिहरत मेरे बारे ! तुम जो संग सिसु लीन्हें । कैसे प्रान रहत सुमिरत सुत, बहु बिनोद तुम कीन्हें ॥ २ ॥ जिन्ह श्रवननि कल बचन तिहारे सुनि सुनि हौं अनुरागी । तिन्ह श्रवननि बनगवन सुनति हौं मोतें कौन अभागी ? ॥ ३ ॥ जुग सम निमिष जाहिं रघुनंदन, बदनकमल बिनु देखे । जौ तनु रहै बरष बीते, बलि, कहा प्रीति इहि लेखे ? ॥ ४ ॥ तुलसीदास प्रेमबस श्रीहरि देखि बिकल महतारी । गदगद कंठ, नयन जल, फिरि फिरि आवन कह्यो मुरारी ॥ ५ ॥ गी० १२—