भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

गीतावली १७६ हाय ! राजाने स्त्रीके वशीभूत होकर अपना सर्वस्व हार दिया ॥ २ ॥ जैसे मूढ़ पुरुष सुन्दर कांचमणि देखकर हाथसे चिन्तामणि गिरा देता है । ‘राम मुनीश्वरोंके नेत्ररूप चकोरोंके लिये चन्द्रमा हैं और साक्षात् श्रीशंकरके प्राणसर्वस्व हैं ।’ राजाने तो इस बातका भी विचार नहीं किया ॥ ३ ॥ हे तात ! यद्यपि स्वामी ने माया के वशीभूत होकर ही अपने सुखनिधान पुत्र तुम्हें त्याग दिया है, तथापि हे दीनबन्धु, हे दयामय, हे मेरे लाल रघुनन्दन ! तुम हमें तो मत छोड़ो” ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, । माता के ये अतिशय प्रीति और विनययुक्त वचन सुनकर कोमलहृदय भगवान् राम वहांसे चल न सके और सोंचने लगे—‘यदि मैं माताका प्रिय करनेके लिये यहीं रह जाऊँ तो देवता, ब्राह्मण और पृथ्वीका भय कौन दूर करेगा ?’ ॥ ५ ॥ [ ३ ] रहि चलिये सुंदर रघुनायक । जो सुत ! तात-बचन-पालन-रत, जननिउ तात ! मानिबे लायक ॥ १ ॥ बेद-बिदित यह बानि तुम्हारी, रघुपति सदा संत-सुखदायक । राखहु निज मरजाद निगमकी, हौं बलि जाउँ, धरहु धनुसायक ॥ २ ॥ सोक कूप पुर परिहि, मरिहि नृप, सुनि संदेस रघुनाथ-सिधायक । यह दूसन बिधि तोहि होत अब रामचरन-बियोग-उपजायक ॥ ३ ॥ मातु बचन सुनि स्रवत नयन जल, कछुसुभाउ जनु नरतनु-पायक । तुलसिदास सुर-काज न साध्यौ तौ तो दोष होय मोहि महि आयक ॥ ४ ॥ हे सुन्दर रघुनन्दन ! आप रह जाइये । बेटा ! यदि तुम पिताके वचनोंका पालन करनेमें ऐसे तत्पर हो तो हे तात ! तुम्हारे