गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७५ अयोध्याकाण्ड यह जीवन का लाभ लूट लो' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, इस समय नगरमें [रामराज्याभिषेकसम्बन्धी] आनन्दमय बधाई सुनकर कैकेयी व्याकुल हो गयी और देवमायाके वशीभूत हो उसने कठिन कुटिलता धारण कर ली ॥ ४ ॥ वनके लिये विदाई राग गौरी [ २ ] सुनहु राम मेरे प्रानपियारे । वारौं सत्य बचन श्रुति-सम्मत, जाते हौं बिछुरत चरन तिहारे ॥ १ ॥ बिनु प्रयास सब साधनको फल प्रभु पायो, सो तो नाहिं सँभारे । हरि तजि धरमसील भयो चाहत, नृपति नारि बस सरबस हारे ॥ २ ॥ रुचिर कांचमनि देखि मूढ़ ज्यों करतलतें चिंतामनि डारे । मुनि-लोचन-चकोर-ससि राघव, सिव-जीवनधन, सोउ न बिचारे ॥ ३ ॥ जद्यपि नाथ तात ! मायाबस सुखनिधान सुत तुम्हहिं बिसारे । तदपि हमहि त्यागहु जनि रघुपति, दीनबन्धु, दयालु मेरे बारे ॥ ४ ॥ अतिसय प्रति बिनीत बचन सुनि, प्रभु कोमल चित चलत न पारे । तुलसिदास जौ रहौं मातु-हित, को सुर-विप्र-भूमि-भय टारे ? ॥ ५ ॥ [भगवान् रामके मुखसे वनगमनका प्रस्ताव सुन माता कौसल्या कहने लगीं—] "मेरे प्राणधार राम ! सुनो, जिनके कारण तुम्हारे चरणोंका वियोग होता हो, उन श्रुतिसम्मत सत्य वचनोंको मैं तुम्हारे ऊपर निछावर करती हूँ ॥ १ ॥ जो सारे साधनोंका फल है, उस प्रभु को अनायास ही प्राप्त कर लिया । फिर भी उसकी तो सँभाल की नहीं, अब श्रीहरिको त्याग कर धर्मशील होने चले हैं ।