भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

अयोध्याकाण्ड १८१ प्राननाथ सुंदर सुजानमनि, दीनबंधु, जग-आरति-दवन । तुलसिदास प्रभु-पदसरोज तजि रहि हौं कहा करौंगी भवन ? ॥२॥ 'हे प्राणनाथ ! आज आपने ऐसे कठोर वचन किस कारणसे कहे ; हे रमण ! आप मृदुचित और परम कृपालु हैं; आप सबके मनकी गति जानते हैं ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! हे सुन्दर ! हे सुजान- शिरोमणि ! हे दीनबन्धु ! हे जगत्का दुख दूर करनेवाले ! आपके चरणकमलोंको त्यागकर मैं घरमें रहकर क्या करूँगी ; ॥ २ ॥ [ ९ ] मैं तुमसों सतिभाव कही है । बूझति और भाँति भामिनि कत, कानन कठिन कलेस सही है ॥१॥ जौ चलिहौ तौ चलो चलिकै बन, सुनि सिय मन अवलंब लही है । बूड़त बिरह-बारिनिधि मानहु नाह बचनमिस बाँह गही है ॥२॥ प्राननाथके साथ चलीं उठि, अवध सोकसरि उमगि बही है । तुलसी सुनी न कबहुँ काहु कहूँ, तनु परिहरि परिछाँहि रही है ॥३॥ [भगवान् राम बोले—] 'प्रिये ! मैंने तो तुमसे सच्चे मनसे कहा है; तुम इस प्रकार और तरह क्यों समझती हो ; वनमें सच- मुच ही बहुत क्लेश है ॥ १ ॥ यदि तुम चलना ही चाहती हो तो चलो, वनके लिये तैयार हो जाओ ।' यह सुनकर सीताजीके चित्तको सहारा मिल गया, मानो विरहरूप समुद्रमें डूबते-डूबते इस वचनके मिषसे ही पतिदेवने उनकी बाँह पकड़ ली ॥ २ ॥ वे उठकर प्राणनाथके साथ चल दीं । इस समय अयोध्यामें शोककी सरिता उमड़कर बहने लगी । तुलसीदास कहते हैं, यह तो कभी किसीने कहीं नहीं सुना कि शरीरको छोड़कर परछाईं रही हो