गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १८२ (फिर इस समय भगवान् रामको छोड़कर श्रीसीताजी कैसे रह सकती थीं ? ! ॥ ३ ॥ [ १० ] जबहि रघुपति-सँग सीय चली। बिकल-बियोग लोग-पुरतिय कहैं, अति अन्याउ, अली ॥ १ ॥ कोउ कहै, मनिगन तजत काँच लगि, करत न भूप भली। कोउ कहै, कुल कुबेलि कैकेयी दुख-बिष-फलनि फली ॥ २ ॥ एक कहैं, बन जोग जानकी ! बिधि बड़े बिषम बली। तुलसी कुलिसहुकी कठोरता तेहि दिन दलकि दली ॥ ३ ॥ जिस समय भगवान् रामके साथ सीताजी भी चलीं उस समय नगर के नर-नारी वियोगव्यथासे व्याकुल होकर कहने लगे—'अरी आली ! यह तो बड़ा अन्याय हो रहा है' ॥ १ ॥ कोई कहने लगे— 'राजा ने अच्छा नहीं किया। वे काँचके लिये मणियोंको त्याग रहे हैं।' कोई बोले—'कैकेयी कुलके लिये कुवेल (बुरी बेल) रूप है, जो इस समय दुःखरूप विषमय फलोंसे फली है' ॥ २ ॥ किसीने कहा—'विधाता भी बड़ा ही विषम और बलवान् है। भला ! जानकी क्या वनके योग्य हैं ;' तुलसीदासजी कहते हैं, उस दिन तो वज्रकी कठोरता भी तड़ककर नष्ट हो गयी ॥ ३ ॥ [ ११ ] ठाढ़े हैं लषन कमलकर जोरे। उर धकधकी, न कहत कछुसकुचनि,प्रभु परिहरतसबनि तृन तोरे ॥ १ ॥ कृपासिंधु अवलोकि बंधु तन, प्रान-कृपान बीर-सी छोरे। तात बिदा माँगिए मातुसों, बनि है बात उपाइ न औरे ॥ २ ॥