गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८३ अयोध्याकाण्ड जाइ चरन गहि आयसु जांची, जननि कहत बहुभांति निहोरे । सिय-रघुबर-सेवा सुचि ह्वैहौ तौ जानिहौं, सही सुत मोरे ॥३॥ कीजहु इहै बिचार निरंतर, राम समीप सुकृत नंहि थोरे । तुलसी सुनि सिष चले चकित-चित उड़यो मानो बिहग बधिक भए भोरे ॥४॥ श्रीलक्ष्मणजी करकमल जोड़े हुए खड़े हैं। उनके हृदयमें धकधकी लगी हुई है, संकोचवश कुछ कहते नहीं। बस, यही सोचते हैं—] 'हाय ! इस समय तो प्रभु सभीको तृण तोड़कर त्याग रहें हैं [न जाने, इस सेवकको भी साथ लेंगे या नहीं ; ] ॥ १ ॥ कृपासागर भगवान् रामने भाईको वीरोंके समान प्राणरूप कृपाण निकाले हुए देख [अर्थात् वीर जैसे तलवार खोले खड़े रहते हैं इसी तरह लक्ष्मणजीको प्राण निछावर करनेके लिये उद्यत देख । ] उनसे कहा—'भैया ! मातासे विदा माँग आओ, इसके सिवा किसी और तरह बात नहीं बन सकेगी' ॥ २ ॥ जब लक्ष्मणने जाकर माताके चरण पकड़कर उनसे आज्ञा माँगी, तब माताने लक्ष्मणजीसे बहुत निहोरा करके कहा—'यदि तुम राम और सीताकी सेवा करके पवित्र होगे तभी मैं तुम्हें अपना सच्चा पुत्र जानूंगी ॥ ३ ॥ तुम बारम्बार यह विचार करना कि रघुनाथजीके पास रहना कोई कम पुण्यकी बात नहीं है।' तुलसीदास कहते हैं, माता की शिक्षा सुन लक्ष्मणजी इस प्रकार चकितचित्त होकर चले जैसे वधिकको असावधान देखकर पक्षी उड़ जाता है ॥ ४ ॥ राग सोरठा [ १२ ] मोको बिधुबदन बिलोकन दीजै । राम लषन मेरी यहैं भेंट, बलि, जाउ, जहाँ मोहि मिलि लीजै ॥१॥