गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १८४ सुनि पितु-बचन चरन गहे रघुपति, भूप अंक भरि लीन्हें। अजहुँ अवनि बिदरत दरार मिस सो अवसर सुधि कीन्हें ॥२॥ पुनि सिर नाइ गवन कियो प्रभु, मुरछित भयो भूप न जाग्यो। करम-चोर नृप-पथिक मारि मानो राम-रतन लै भाग्यो ॥३॥ तुलसी रबिकुल-रबि रथ चढ़ि चले तकि दिसि दखिन सुहाई। लोग नलिन भए मलिन अवध-सर, बिरह विषम हिम पाई ॥४॥ [ भगवान्को वनकी ओर जाते सुन महाराज दशरथ कहने लगे—] 'हे राम-लक्ष्मण ! मुझे अपना मुखचन्द्र देख लेने दो। अब मेरा तो यहाँकी अन्तिम भेंट है। मैं बलिहारी जाता हूँ, जहाँ भी जाओ, मुझसे मिलकर जाना' ॥ १ ॥ पिताके ये वचन सुन रघुनाथजीने उनके चरण पकड़ लिये। तब राजाने भी उन्हें छातीसे लगा लिया। उस अवसरकी याद आनेपर तो आज भी पृथ्वी दरारके मिससे विदीर्ण हो जाती है ॥ २ ॥ फिर प्रभुने सिर नवाकर वनके लिये प्रस्थान किया। उस समय महाराज मूर्च्छित हो गये और उन्हें फिर चेतना न हुई, मानो कर्मरूप चोर राजारूप पथिकको मारकर उसका रामरूप रत्न लेकर भाग गया ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, तदनन्तर भानुकुल-भानु भगवान् राम रथपर आरूढ़ हो अति सुहावनी दक्षिणदिशाको चले। उस समय प्रभुका विरहरूप विषम हिम पाकर आयोध्यारूप सरोवरके पुरजनरूप कमल मुरझा गये ॥ ४ ॥ वनके मार्गमें राग बिलावल [ १३ ] कहौँ सो बिपिन हैं धौं केतिक दूरि। जहाँगवनकियो, कुँवरकोसलपति, बूझतिसिय पिय पतिहि बिसूरि ॥१॥