गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८५ अयोध्याकाण्ड प्राननाथ परदेस पयादेहि चले सुख सकल तजे तृन तूरि । करौं बयारि, बिलंबिय बिटपतर, झारौं हौं चरन-सरोरुह-धूरि ॥२॥ तुलसिदास प्रभु प्रियाबचन सुनि नीरजनयन नीर आए पूरि । कानन कहां अबहिं सुनु सुंदरि, रघुपति फिरि चितए हित भूरि ॥३॥ (मार्गमें थक जानेसे) श्रीजानकीजी चिन्तित होकर भगवान् रामसे पूछती हैं—'हे कोसलराजकुमार ! आपने जहांके लिये प्रस्थान किया है वह वन यहाँसे कितनी दूर है; ॥ १ ॥ हे प्राणनाथ ! आपने सब सुखोंको तृण तोड़कर त्याग दिया (सुखोंसे एकदम सम्बन्ध त्याग कर दिया) और अब परदेशको पैदल ही जा रहे हैं। (आप थक गये होंगे) कुछ देर इस वृक्षके नीचे विश्राम कीजिये; मैं आपको हवा करूँगी और चरणकमलोंकी धूलि झाड़ूँगी' ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, प्रियाके ये वचन सुनकर प्रभुके नेत्रकमलोंमें जल भर आया; और 'अरि सुन्दरि ! अभी वन कहाँ ;' ऐसा कहकर उनकी ओर अत्यन्त प्रीतिपूर्वक निहारा ॥ ३ ॥ [ १४ ] फिरि फिरि राम सीय तनु हेरत । तृषित जानि जल लेन लषन गए, भुज उठाइ ऊँचे चढ़ि टेरत ॥१॥ अवनि कुरंग, बिहंग द्रुम-डारन रूप निहारत पलक न प्रेरत । मगन न डरत निरखि कर-कमलनि सुभग सरासन सायक फेरत ॥२॥ अवलोकत मग-लोग चहुँ दिसि, मनहु चकोर चंद्रमहि घेरतः । ते जन भूरिभाग भूतलपर तुलसी राम-पथिक-पद जे रत ॥३॥ भगवान् राम मुड़-मुड़कर सीताजीकी ओर देखते हैं। उन्हें प्यासी जानकर लक्ष्मणजी जल लेने गये, तब भगवान् ऊँचे टीलेपर