गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १८६ चढ़कर उन्हें भुजा उठाकर पुकारते हैं ॥ १ ॥ पृथ्वीपर मृग और वृक्षोंकी डालियोंपर पक्षी प्रभुका रूप-लावण्य देख रहे हैं—वे पलक भी नहीं मारते और प्रभुको अपने धनुष-बाणपर कर-कमल फेरते देखकर भी भय नहीं मानते—प्रेममें मग्न हो रहे हैं॥ २ ॥ मार्गमें लोग चारों दिशाओंसे देख रहे हैं, मानो चकोर पक्षी चन्द्रमाको घेरे हुए हों। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग बटोही रामके चरणोंमें रत हैं, वे पृथ्वीपर बड़े ही भाग्यशाली हैं ॥ ३ ॥ [ १५ ] नृपति-कुंवर राजत मग जात । सुंदर बदन, सरोरुह-लोचन, मरकत-कनकबर न मृदु गात ॥१॥ अंसनि चाप, तून कटि मुनि पट, जटामुकुट बिच नूतन पात । फेरत पानि सरोजनि सायक, चोरत चितहि सहज मुसुकात ॥२॥ संग नारि सुकुमारि सुभग सुठि, राजति बिन भूषन नव सात । सुखमा निरखि ग्राम-बनितनिके नलिन-नयन बिकसित मनो प्रात ॥३॥ अंग-अंग अगनित अनंग-छबि, उपमा कहत सुकबि सकुचात । सिय समेत नित तुलसिदास चित, बसत किसोर पथिक दोउ भ्रात ॥४॥ मार्गमें जाते हुए राजकुमार बड़े ही शोभायमान हो रहे हैं। उनका सुन्दर मुखमण्डल है, कमलके समान नेत्र हैं तथा मरकतमणि और सुवर्णके-से रंगके मृदुल शरीर हैं ॥ १ ॥ वे कन्धोंपर धनुष रखे हुए हैं, कमरमें तरकस और मुनिजनोचित वस्त्र हैं, सिरपर जटा-जूटका मुकुट है, जिसमें बीच-बीचमें नवीन पत्ते खोंसे हुए हैं। वे धनुषपर अपना करकमल फेर रहे हैं और स्वभावसे मुसकराते ही चित्तको चुरा लेते हैं ॥ २ ॥ उनके साथमें सोलहों शृङ्गार किये