गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८७ अयोध्याकाण्ड बिना ही एक अति सुन्दरी सुकुमारी स्त्री शोभायमान है। उनकी शोभा देखते ही ग्रामीण स्त्रियोंके नेत्रकमल प्रातःकालीन कमलोंके समान खिल उठते हैं॥ ३॥ उनके अङ्ग-अङ्गमें अगणित कामदेवोंकी शोभा है, उसकी उपमा कहनेमें अच्छे-अच्छे कवि भी संकोच मानते हैं। तुलसीदासके हृदयमें तो सीताजीके सहित वे किशोर अवस्थावाले बटोही दोनों भाई सर्वदा विराजमान रहते हैं॥ ४॥ [ १६ ] तू देखि देखि री ! पथिक परम सुंदर दोऊ। मरकत-कलधौत-बरन, काम-कोटि-कांतिहरन, चरन-कमल कोमल अति, राजकुँवर कोऊ ॥ १ ॥ करसर-धनु, कटि निषंग, मुनिपट सोहैं सुभग अंग, संग चंद्रबदनि बधू, सुंदरि सुठि सोऊ। तापस बर बेष किए, सोभा सब लूटि लिए, चितके चोर, बय किसोर, लोचन भरि जोऊ ॥ २ ॥ दिनकर-कुलमनि निहारि प्रेम-मगन ग्राम-नारि, परस्पर कहैं, सखि ! अनुराग ताग पोऊ। तुलसी यह ध्यान-सुधन जानि मानि लाभ सघन, कृपिन ज्यों सनेह सो हिये-सुगेह गोऊ ॥ ३ ॥ [कोई ग्रामीण स्त्री कहती है—] 'अरी सखि ! तू देख तो ये दोनों पथिक बड़े ही सुन्दर हैं। ये मरकत और सुवर्णके समान स्याम एवं गौरवर्ण हैं, करोड़ों कामदेवोंकी कान्तिको हरनेवाले हैं तथा इनके चरण-कमल अत्यन्त कोमल हैं। जान पड़ता है—ये कोई राजकुमार हैं ॥ १ ॥ इनके हाथोंमें धनुष-बाण हैं, कमरमें