भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 194

गीतावली १८८ तरकस है तथा सुन्दर शरीरमें मुनिजनोचित वस्त्र शोभायमान है। इनके साथ एक चन्द्रमुखी स्त्री है, वह भी बड़ी ही सुन्दरी है। इन्होंने तपस्वियोंका-सा सुन्दर वेष धारणकर मानो सारी शोभा लूट ली है। इस किशोर अवस्थावाले चित्तचोरोंको तनिक नेत्र भरकर देख ले' ॥ २ ॥ तब सूर्यकुलशिरोमणि भगवान् रामको देख- कर सब ग्राम-नारियाँ प्रेममें मग्न हो गयीं और आपसमें कहने लगीं— 'अरि सखि ! इन मणियोंको प्रेमरूप तागेमें पिरो लो'। तुलसीदास कहते हैं, इस ध्यानको शुभ धन जानकर और इसे ही बड़ा भारी लाभ समझकर तू कृपणके समान प्रेमपूर्वक अपने हृदयरूप घरमें छिपाकर रख ॥ ३ ॥ [ १७ ] कुँवर साँवरो, री सजनी ! सुंदर सब अंग। रोम रोम छबि निहारि आलि वारि फेरि डारि, कोटि भानु-सुवन सरद-सोम, कोटि अनंग ॥ १ ॥ बाम अंग लसत चाप, मौलि मंजु जटा-कलाप, सुचि सर कर, मुनिपट कटि-तट कसे निषंग। आयत उर-बाहु नैन, मुख-सुखमाको लहै न, उपमा अवलोकि लोक, गिरामति-गति भंग ॥ २ ॥ यों कहि भईं मगन बाल, बिथकीं सुनि जुवति-जाल, चितवत चले जात संग, मधुप-मृग-बिहंग। बरनौं किमि तिनकी दसहि, निगम-अगम प्रेम-रसहि, तुलसी मन-बसन रँगे रुचिर रूपरंग ॥ ३ ॥ 'अरि सखि ! यह साँवला कुमार तो सभी अङ्गोंसे सुन्दर है। अरी आली ! इनकी रोम-रोम की छवि देखकर इनपर करोड़ों