गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 195, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें१८६ अयोध्याकाण्ड अश्विनीकुमार, शरद्ऋतुके चन्द्रमा और कामदेव निछावर कर दे॥१॥ इनके वामभागमें धनुष शोभायमान है, सिरपर मनोहर जटाजूट है, हाथमें सुन्दर बाण है तथा कटिप्रदेशमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस कसे हुए हैं। इनके वक्षःस्थल, भुजाएँ और नेत्र विशाल हैं तथा मुखकी शोभा तो कोई भी नहीं पा सकता। संसारमें इनकी उपमा देखते-देखते तो सरस्वतीकी बुद्धिकी भी गति नष्ट हो गयी है'॥२॥ ऐसा कहकर ग्रामकी बालाएँ भगवान्की रूपराशिमें डूब गयीं तथा उनकी बातें सुनकर नवयुवतियाँ थकी-सी रह गयीं। भौंरे, मृग और पक्षिगण तो प्रभुको निहारते हुए उन्हींके संग हो लिये। तुलसीदास कहते हैं, उनके शरीरकी दशा तथा वेदके लिये भी अगम्य प्रेमरसका मैं कैसे वर्णन करूँ ? उनके मनरूप वस्त्र प्रभुके अति रुचिर रूप-रंगमें रँग गये ॥ ३ ॥ राग कल्याण [ १८ ] देखु, कोऊ परम सुंदर सखि ! बटोही । चलत महि मृदु चरन अरुन-बारिज-बरन, भूपसुत रूपनिधि निरखि हौं मोही ॥ १ ॥ अमल मरकत स्याम, सील-सुखमा-धाम, गौरतनु सुभग सोभा सुमुखि जोही । जुगल बिच नारि सुकुमारि सुठि सुंदरी, इंदिरा इंदु-हरि मध्य जनु सोही ॥ २ ॥ करनि बर धनु तीर, रुचिर कटि तूनीर, बीर, सुर-सुखद, मरदन अवनि-द्रोही ।