गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६० अंबुजायत नयन, बदन-छबि बहु मयन, चारु चितवनि चतुर लेति चित पोही ॥ ३ ॥ बचन प्रिय सुनि श्रवन राम करुनाभवन, चितए सब अधिक हित सहित कछु ओही । दास तुलसी नेह-बिबस बिसरी देह, जानि नहि आपु तेहि काल धौं को ही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! देख तो कोई बड़े ही सुन्दर बटोही राजकुमार अपने अरुणकमलवत् कोमल चरणोंसे पृथ्वीपर पैदल जा रहे हैं ; उन रूपनिधानको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ अरी सुमुखि ! मैंने उनके शील और सुषमाके आगार, स्वच्छ मरकतमणि- के समान श्याम तथा अति सुन्दर गोरे शरीरोंकी शोभा देखी है । उन दोनोंके बीचमें एक परम लावण्यमयी और सुन्दरी सुकुमारी नारी है, मानो चन्द्रमा और श्रीहरिके मध्यमें साक्षात् लक्ष्मीजी ही विराजमान हों ॥ २ ॥ उनके करकमलोंमें मनोहर धनुष-बाण हैं और कमरमें सुन्दर तरकस है । वे बड़े ही धीर, देवताओंको सुख देनेवाले और पृथ्वीके द्रोहियोंका दमन करनेवाले हैं । उनके नयन कमलदलके समान विशाल और मुखकी कान्ति अनेकों कामदेवोंके सदृश है तथा वे परम चतुर अपनी चारु चितवनसे सबके चित्तोंको आकर्षित कर लेते हैं' ॥ ३ ॥ उनके ये प्रिय वचन कानोंमें पड़ते ही करुणा-अयन भगवान् रामने उनकी ओर कुछ और भी अधिक प्रीतिसे देखा । तुलसीदासजी कहते हैं, तब प्रेमसे अधीर हो जानेके कारण उन्हें अपनी शरीरकी सुधि जाती रही और उस समय किसीको अपना भी ज्ञान न रहा ॥ ४ ॥