भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196

गीतावली १६० अंबुजायत नयन, बदन-छबि बहु मयन, चारु चितवनि चतुर लेति चित पोही ॥ ३ ॥ बचन प्रिय सुनि श्रवन राम करुनाभवन, चितए सब अधिक हित सहित कछु ओही । दास तुलसी नेह-बिबस बिसरी देह, जानि नहि आपु तेहि काल धौं को ही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! देख तो कोई बड़े ही सुन्दर बटोही राजकुमार अपने अरुणकमलवत् कोमल चरणोंसे पृथ्‍वीपर पैदल जा रहे हैं ; उन रूपनिधानको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ अरी सुमुखि ! मैंने उनके शील और सुषमाके आगार, स्वच्छ मरकतमणि- के समान श्याम तथा अति सुन्दर गोरे शरीरोंकी शोभा देखी है । उन दोनोंके बीचमें एक परम लावण्यमयी और सुन्दरी सुकुमारी नारी है, मानो चन्द्रमा और श्रीहरिके मध्यमें साक्षात् लक्ष्मीजी ही विराजमान हों ॥ २ ॥ उनके करकमलोंमें मनोहर धनुष-बाण हैं और कमरमें सुन्दर तरकस है । वे बड़े ही धीर, देवताओंको सुख देनेवाले और पृथ्‍वीके द्रोहियोंका दमन करनेवाले हैं । उनके नयन कमलदलके समान विशाल और मुखकी कान्ति अनेकों कामदेवोंके सदृश है तथा वे परम चतुर अपनी चारु चितवनसे सबके चित्तोंको आकर्षित कर लेते हैं' ॥ ३ ॥ उनके ये प्रिय वचन कानोंमें पड़ते ही करुणा-अयन भगवान् रामने उनकी ओर कुछ और भी अधिक प्रीतिसे देखा । तुलसीदासजी कहते हैं, तब प्रेमसे अधीर हो जानेके कारण उन्हें अपनी शरीरकी सुधि जाती रही और उस समय किसीको अपना भी ज्ञान न रहा ॥ ४ ॥