गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६१ अयोध्याकाण्ड राग केदारा [ १९ ] सखि ! नीके कै निरखि, कोऊ सुठि सुंदर बटोही । मधुर मूरति मदनमोहन जोहन-जोग, बदन सोभासदन, देखि हौं मोही ॥ १ ॥ साँवरे-गोरे किसोर, सुर-मुनि-चित्त-चोर, उभय-अंतर एक नारि सोही। मनहु बारिद-बिधु बीच ललित अति, राजति तड़ित निज सहज बिछोही ॥ २ ॥ उर धीरजहि धरि, जनम सफल करि, सुनहि सुमुखि ! जनि बिकल होही। को जाने, कौने सुकृत लह्यो है लोचन-लाहु, ताहितैं बारहि बार कहति तोही ॥ ३ ॥ सखिहि सुसिख दई, प्रेम-मगन भई, सुरति बिसरि गई आपनी ओही। तुलसी रही है ठाढ़ी पाहन गढ़ी-सी काढ़ी, कौन जाने, कहाँतें आई, कौनकी कोही ॥ ४ ॥ 'अरि सखि ! तनिक अच्छी तरह देख, कोई बड़े ही सुन्दर बटोही जा रहे हैं । देख, कामदेवको भी लुभानेवाली इनकी मधुर मूर्ति देखने ही योग्य है । इनके शोभामय मुखमण्डलको देखकर मैं तो मोहित हो गयी हूँ ॥ १ ॥ ये साँवरे-गोरे किशोरवयस्क बालक देवता और मुनियोंके भी चित्तको चुरानेवाले हैं। इन दोनोंके बीचमें एक सुन्दरी बाला सुशोभित है, मानो मेघ और चन्द्रमाके मध्यमें अति ललित विद्युत् अपना स्वभाव (चंचलता) छोड़कर विराज रही