गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६२ हो ॥ २ ॥ अरी सखि ! मैं जो कुछ कहती हूँ वह सुन, व्याकुल मत हो और चित्तमें धैर्य धारण कर अपना जन्म सफल कर ले। कौन जाने, आज किस पुण्यके प्रतापसे हमें यह नेत्रोंका लाभ मिला है; इसीसे मैं तुझसे बारंबार कह रही हूँ ॥ ३ ॥ इस प्रकार सखीको सुशिक्षा दे वह प्रेममें डूब गयी और उसे अपनी सुधि जाती रही। तुलसीदास कहते हैं, फिर तो वह पत्थरमें गढ़कर काढ़ी हुई (मूर्ति) के समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह गयी। फिर यह कौन जाने कि वह कहाँसे आयी थी और किसकी कौन लगती थी ? ॥ ४ ॥ [ २० ] माई ! मनके मोहन जोहन-जोग जोही। थोरी ही बयस गोरे-सांवरे सलोने लोने, लोयन ललित, बिधुबदन बटोही ॥ १ ॥ सिरनि जटा-मुकुट मंजुल सुमनजुत, तैसिये लसति नव पल्लव खोही। किये मुनि-बेष बीर, घरे धनु-तून-तीर, सोहैं मग, को हैं, लखि परै न मोही ॥ २ ॥ सोभाको सांचो सँवारि रूप जातरूप, ढारि नारि बिरची बिरंचि, संग सोही। राजत रुचिर तनु सुंदर धमके कन, चाहे चकचौंधी लागे, कहौं का तोही ? ॥ ३ ॥ सनेह-सिथिल सुनि बचन सकल सिया, चितई अधिक हित सहित ओही। तुलसी मनहु प्रभु-कृपाकी मूरति फिरि हेरि कै हरषि हिये लियो है पोही ॥ ४ ॥