गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६३ अयोध्याकाण्ड अरी माई ! वे मनमोहन वे देखने ही योग्य हैं; आज मैंने उन्हें देखा है। उनकी थोड़ी ही अवस्था है और वे परम सुन्दर साँवले- गोरे, सुन्दर नेत्रवाले, चन्द्रमुख बटोही नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले हैं ॥ १ ॥ उनके सिरपर सुन्दर पुष्पोंके सहित जटाओंका मुकुट है और वैसे ही नवीन पत्तोंकी खोही (पत्तोंका बना हुआ छाता) भी है। वे वीरश्रेष्ठ मुनियोंका वेष बनाये, धनुष-बाण और तरकस धारण किये मार्गमें शोभायमान हैं। वे हैं कौन—यह मैं नहीं जानती ॥ २ ॥ विधाताने शोभाका साँचा और रूपका सुवर्ण बनाकर जो एक स्त्री ढाली है वही उनके साथ शोभायमान है। उनके सुन्दर शरीरपर पसीनेकी सुहावनी बूंदें विराजती हैं। तुझसे क्या कहूँ, उन्हें देखकर आँखोंमें चकाचौंध हो जाती है ॥ ३ ॥ उसके ये सारे वचन सुन सीताजी स्नेहसे शिथिल हो गयीं और उसकी ओर विशेष प्रेमसे देखा। तुलसीदास कहते हैं, मानो प्रभुकृपाकी मूर्तिने उसकी ओर घूमकर प्रसन्नतापूर्वक देखकर उसका हृदय अपनेमें ही अटका लिया है (जिससे अब वह अन्यत्र नहीं जा सकता) ॥ ४ ॥ [ २१ ] सखि ! सरद-बिमल-बिधुबदनि बधूटी । ऐसी ललना सलोनी न भई, न है, न होनी, रत्यो रची बिधि जो छोवत छबि छूटी ॥ १ ॥ साँवरे गोरे पथिक बीच सोहति अधिक, तिहुँ त्रिभुवन-सोभा मनहु लूटी । तुलसी निरखि सिय प्रेमबस कहैं तिय, लोचन-सिसुन्ह देहु अमिय घूटी ॥ २ ॥ गी० १३—