गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १६४ 'अरी सखि ! यह बहू तो शरत्कालीन निर्मल चन्द्र के समान सुन्दर मुखवाली है। ऐसी सुन्दर स्त्री तो न पहले हुई, न है और न आगे ही होगी। विधाताने रतिको भी, इसे सुधारते समय जो छबि रह गयी थी, उसीसे रचा है ॥ १ ॥ यह इन साँवले-गोरे पथिकोंके बीचमें और भी अधिक शोभायमान होती है, मानों इन तीनोंने मिलकर तीनों लोकोंकी शोभा लूट ली हो।' तुलसीदासजी कहते हैं, सीताको देखकर स्त्रियाँ प्रेमके वशीभूत होकर कहती हैं— 'अरी ! अपने नेत्ररूप बालकों यह अमृतमयी घुट्टी पिलाओ' ॥ २ ॥ [ २२ ] सोहैं साँवरे पथिक, पाछे ललना लोनी। दामिनि-बरन गोरी, लखि सखि तृन तोरी, बीती हैं बय किसोरी, जोबन होनी ॥ १ ॥ नीके कै निकाई देखि, जनम सफल लेखि, हम-सी भूरि-भागिनि नभ न छोनी। तुलसी-स्वामी-स्वामिनि जोहे मोही हैं भामिनि, सोभा-सुधा पिए करि अँखिया दोनी ॥ २ ॥ साँवले पथिकके पीछे यह अति सुन्दरी ललना शोभायमान है। यह बिजलीके समान गौरवर्ण है। देखकर सखियाँ तृण तोड़ती और कहती हैं—'इसकी किशोरावस्था तो बीत चुकी है, अब यौवन आनेवाला है। ॥१॥ इसकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर अपना जन्म सफल समझो। हमारे समान बड़भागिनी स्त्रियाँ तो स्वर्गमें अथवा पृथ्वीपर कहीं भी नहीं हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, स्वामी और स्वामिनीजीको देखकर ग्रामोंकी स्त्रियाँ उनके सौन्दर्य- सुधा-को नेत्ररूप दोनोंसे पीकर मोहित हो रही हैं ॥ २ ॥