भारतकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

१६५ अयोध्याकाण्ड [ २३ ] पथिक गोरे-सांवरे सुठि लोने। संग सुतिय, जाके तनुतें लही है द्युति सोन सरोरुह सोने॥ १ ॥ बय किसोर-सरि-पार मनोहर बयस-सिरोमनि होने। सोभा-सुधा आलि ! अँचवहु करि नयन मंजु मृदु दोने॥ २ ॥ हेरत हृदय हरत, नहि फेरत चाह बिलोचन कोने। तुलसी प्रभु किधौं प्रभुको प्रेम पढ़े प्रगट कपट बिनु टोने॥ ३ ॥ 'ये सांवले-गोरे पथिक बड़े ही सुन्दर और सुहावने हैं इनके साथ एक सुन्दर स्त्री है जिसके शरीरसे अरुणकमल और सुवर्णने भी कान्ति पायी है॥ १ ॥ किशोरावस्थारूप सरिताको पाकर अब 'ये आयुशिरोमणि युवावस्थामें प्रवेश करनेवाले हैं। अरी आली ! अपने नेत्रोंको मनोहर और मृदुल दोनों बनाकर इनकी छबिरूप अमृतका पान करो॥ २ ॥ ये देखते ही हृदय हर लेते हैं और मनोहर नेत्र कोने नहीं फेरते।' तुलसीदास कहते हैं कि प्रभु अथवा प्रभुका प्रेम तो किसी प्रकारका दुराव न रखकर स्पष्ट ही टोना पढ़ता है॥३॥ [ २४ ] मनोहरताके मानो ऐन। स्यामल-गोर किसोर पथि दोउ, सुमुखि ! निरखु भरि नैन॥ १ ॥ बीच बधू बिधुबदनि बिराजति, उपमा कहुँ कोऊ है न। मानहु रति ऋतुनाथ सहित मुनिबेष बनाए है मैन॥ २ ॥ किधौं सिंगार-सुखमा-सुप्रेम मिलि चले जग-चित-बित लैन। अदभुत त्रयी किधौं पठई है बिधि मग-लोगन्हि सुख दैन॥ ३ ॥ सुनि सुचि सरल सनेहु सुहावने ग्रामबधुन्हके बैन। तुलसी प्रभु तरु तर बिलंबे, किये प्रेम कनौड़े कें न ? ॥ ४ ॥