गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें'अरी सखि ! तनिक नेत्र भरकर देख, ये दोनों श्याम-गौर किशोर-वयस्क पथिक तो मानो मनोहरताके आश्रय ही हैं ॥ १ ॥ इनके बीचमें एक चन्द्रमुखी स्त्री विराज रही है, जिसकी कहीं कोई भी उपमा नहीं है, मानो रति और ऋतुराज बसन्तके सहित साक्षात् कामदेव ही मुनिवेश धारण किये हों ॥ २ ॥ अथवा शृङ्गार, सुन्दरता और सुप्रेम ही आपसमें मिलकर संसारका चित्तरूप धन हरण करने- के लिये तो नहीं चले, किंवा विधाताने अद्भुतत्रयी (वशीकरण, आकर्षण और मोहनी) को ही मार्गस्थ लोगोंको सुख देनेके लिये भेजा है' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ग्रामवधुओंके ये पवित्र, सरल, स्नेहमय, सुहावने वचन सुनकर प्रभु एक वृक्षके नीचे ठहर गये, क्योंकि प्रेम करनेपर वे किसके कनौड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥ [ २५ ] बय किसोर गोरे साँवरे धनुबान धरे हैं। सब अँग सहज सोहावने, राजिव जिते नैननि-बदननि बिधु निदरे हैं॥ १ ॥ तून - सुमुनिपट कटि कसे, जटामुकुट करे हैं। मंजु मधुर मृदुमूरति, पानह्रों न पायनि, कैसे धौं पथ बिचरे हैं॥ २ ॥ उभय बीच बनिता बनी, लखि मोहि परे हैं। मदन सप्रिया सप्रिय सखा मुनि-बेष बनाए लिए मन जात हरे हैं॥ ३ ॥ सुनि जहँ तहँ देखन चले अनुराग भरे हैं। राम-पथिक छवि निरखि कैं, तुलसी, मग-लोगनि धाम- काम बिसरे हैं॥ ४ ॥