गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
'अरी सखि ! तनिक नेत्र भरकर देख, ये दोनों श्याम-गौर किशोर-वयस्क पथिक तो मानो मनोहरताके आश्रय ही हैं ॥ १ ॥ इनके बीचमें एक चन्द्रमुखी स्त्री विराज रही है, जिसकी कहीं कोई भी उपमा नहीं है, मानो रति और ऋतुराज बसन्तके सहित साक्षात् कामदेव ही मुनिवेश धारण किये हों ॥ २ ॥ अथवा शृङ्गार, सुन्दरता और सुप्रेम ही आपसमें मिलकर संसारका चित्तरूप धन हरण करने- के लिये तो नहीं चले, किंवा विधाताने अद्भुतत्रयी (वशीकरण, आकर्षण और मोहनी) को ही मार्गस्थ लोगोंको सुख देनेके लिये भेजा है' ॥ ३ ॥ तुलसीदास कहते हैं, ग्रामवधुओंके ये पवित्र, सरल, स्नेहमय, सुहावने वचन सुनकर प्रभु एक वृक्षके नीचे ठहर गये, क्योंकि प्रेम करनेपर वे किसके कनौड़े नहीं हो जाते ॥ ४ ॥ [ २५ ] बय किसोर गोरे साँवरे धनुबान धरे हैं। सब अँग सहज सोहावने, राजिव जिते नैननि-बदननि बिधु निदरे हैं॥ १ ॥ तून - सुमुनिपट कटि कसे, जटामुकुट करे हैं। मंजु मधुर मृदुमूरति, पानह्रों न पायनि, कैसे धौं पथ बिचरे हैं॥ २ ॥ उभय बीच बनिता बनी, लखि मोहि परे हैं। मदन सप्रिया सप्रिय सखा मुनि-बेष बनाए लिए मन जात हरे हैं॥ ३ ॥ सुनि जहँ तहँ देखन चले अनुराग भरे हैं। राम-पथिक छवि निरखि कैं, तुलसी, मग-लोगनि धाम- काम बिसरे हैं॥ ४ ॥
१६७ अयोध्याकाण्ड 'कुमारोंकी किशोरावस्था है, श्याम ओर गौरवर्ण हैं और धनुष- बाण धारण किये हैं। उनके सभी अङ्ग सहज शोभायुक्त हैं, नेत्रोंने कमलोंको जीत लिया है और मुख चन्द्रमाका निरादर करता है ॥ १ ॥ वे कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र तथा तरकस कसे हुए हैं और सिरपर जटाओंका मुकुट बनाये हैं। उनकी अति मञ्जुल और मधुर मृदुल मूर्ति है, पैरोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, न जाने ये किस प्रकार मार्गमें चलकर आये हैं ॥ २ ॥ दोनोंके बीचमें एक स्त्रीरत्न है, उन्हें देखकर हम तो मोहित हो गयी हैं, मानो साक्षात् कामदेव ही अपनी प्रिया रति और प्रिय सखा बसन्तके साथ मुनिवेष बनाकर हमारे चित्तको हरे लिये जाता है' ॥ ३ ॥ यह सुनकर सब लोग जहाँ-तहाँ प्रेमसे भरकर उन्हें देखनेके लिये चल दिये । तुलसीदास कहते हैं, बटोही रामकी छबि देखकर मार्गके लोग अपने घरके धंधोंको भी भूल गये हैं ॥ ४ ॥ [ २६ ] कैसे पितु-मातु, कैसे ते प्रिय-परिजन हैं ? जगजलधि ललाम, लोने लोने, गोरे-स्याम, जिन पठाए हैं ऐसे बालकनि बन हैं ॥ १ ॥ रूपके न पारावार, भूपके कुमार मुनिबेष, देखत लोनाई लघु लागत मदन हैं। सुखमाकी मूरति-सी साथ निसिनाथ-मुखी, नखसिख अंग सब सोभाके सदन हैं ॥ २ ॥ पंकज-करनि चाप, तीर-तरकस कटि, सरद-सरोजहुतें सुंदर चरन हैं।
सीता-राम-लखन निहारि ग्रामनारि कहें, हेरि, हेरि, हेरि ! हेली हियके हरन हैं ॥ ३ ॥ प्रानहूके प्रानसे, सुजीवनके जीवनसे, प्रेमहूके प्रेम, रंक कृपिनके धन हैं। तुलसीके लोचन-चकोरके चंद्रमासे, आछे मन-मोर चित-चातकके घन हैं ॥ ४ ॥ "अरी सखि ! वे माता-पिता कैसे हैं ? और कैसे वे प्रिय कुटुम्बी लोग हैं जिन्होंने संसारसमुद्रके सुन्दर रत्नरूप इन सलोने श्याम-गौर बालकोंको वनमें भेज दिया है ? ॥ १ ॥ इनके रूपका पारावार नहीं है; इन मुनिवेषधारी राजकुमारोंकी सुन्दरता देखकर तो कामदेव भी तुच्छ जान पड़ता है। इनके साथ सौन्दर्यकी मूर्ति-जैसी एक चन्द्रमुखी बाला है जिसके नखसे लेकर शिखापर्यन्त सभी अङ्ग शोभाके आश्रय हैं ॥२॥ इनके करकमलोंमें धनुष है और कमरमें तीरोंसे भरा तरकस है तथा इनके चरण शरत्कालीन कमलसे भी सुन्दर हैं।' इस प्रकार सीता, राम और लक्ष्मणको देखकर गाँवोंकी स्त्रियाँ कहती हैं—'अरी सहेली ! देख, देख, देख, तो बड़े ही चित्तको चुरानेवाले हैं ॥ ३ ॥ ये तो प्राणोंके भी प्राण-जैसे, जीवनके भी जीवन-जैसे, प्रेमके भी प्रेम- जैसे और रंक तथा कृपणोंके भी धन-जैसे हैं। ये तुलसीदासके नेत्र- रूप चकोरके लिये चन्द्रमाके समान तथा मनरूप मोर और चित्तरूप चातकके लिये सुन्दर मेघके समान हैं ॥ ४ ॥ राग भैरव [ २७ ] देखि ! द्वै पथिक गोरे-सांवरे सुभग हैं। सुतिय सलोनी संग सोहत सुंमग हैं ॥ १ ॥
१६६ अयोध्याकाण्ड सोभासिंधु-संभव-से नीके नीके नग हैं। मातु-पितु-भाग बस गए परि फँग हैं॥ २॥ पाइँ पनह्यो न, मृदु पंकज-से पग हैं। रूपकी मोहनी मेल्लि मोहे अग-जग हैं॥ ३॥ मुनि-बेष घरे, धनु-सायक सुलग हैं। तुलसी हिये लसत लोने लोने डग हैं॥ ४॥ 'अरी सखि ! देख, दो अति सुन्दर सांवले-गोरे पथिक जा रहे हैं। मार्गमें उनके साथ एक अति सुन्दरी और सलोनी स्त्री भी शोभायमान है ॥ १ ॥ ये शोभारूप समुद्रके सुन्दर रत्नके समान हैं; इस समय माता-पिताके दुर्भाग्यवश फन्देमें पड़ गये हैं ॥ २ ॥ इनके चरण कमलके समान कोमल हैं, परन्तु उनमें जूतियाँ भी नहीं हैं। इन्होंने अपने रूपकी मोहनी डालकर सारे स्थावर, जङ्गम प्राणियोंको मोहित कर लिया है ॥ ३ ॥ ये मुनिवेष धारण किये हैं और इनके पास धनुष-बाण भी हैं।' इनके सुन्दर-सुन्दर डग तुलसीदासके हृदय में विराजमान हैं ॥ ४ ॥ [ २८ ] पथिक पयादे जात पंकज-से पाय हैं। मारग कठिन, कुस-कंटक-निकाय हैं॥ १॥ सखी ! भूखे-प्यासे, पै चलत चित चाय हैं। इन्हके सुकृत सुर-संकर सहाय हैं॥ २॥ रूप-सोभा-प्रेमके-से कमनीय काय हैं। मुनिबेष किये किधों ब्रह्म-जीव-माय हैं॥ ३॥ बीर, बरियार, धीर, धनुधर-राय हैं। दसचारि-पुर-पाल आली उरगाँये हैं॥ ४॥
गीतावली २०० मग-लोग देखत करत हाय हाय हैं। बन इनको तो बाम बिधि के बनाय हैं ॥ ५ ॥ धन्य ते, जे मीन-से अवधि अंबु-आय हैं। तुलसी प्रभुसों जिन्हहुँके भले भाय हैं ॥ ६ ॥ हाय ! ये पथिक अपने कमलसदृश चरणोंसे पैरों ही चल रहे हैं। मार्ग बड़ा ही कठोर है तथा उसमें कुश और कण्टकोंका समूह भरा हुआ है ॥ १ ॥ हे सखि ! फिर भी ये भूखे-प्यासे बड़े चावसे चले जा-रहे हैं। मालूम होता है, इनके पुण्यबलसे देवता और महादेवजी इनके सहायक हैं ॥२॥ ये मानो रूप, शोभा और प्रेमकी मनोहर मूर्तियाँ ही हैं अथवा मुनिवेष धारण किये ब्रह्म, माया और जीव ही विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ये वीर, बलवान्, धैर्यवान् और धनुर्धरोंमें अग्रगण्य हैं अथवा चौदहों भुवनोंकी रक्षा करनेवाले महा- कीर्तिशाली हरि ही हैं ॥ ४ ॥ मार्गके लोग देखकर 'हाय ! हाय ! !' करते हैं और कहते हैं कि 'इन्हें जो वनवास हुआ है सो विधाता इनके लिये बहुत ही टेढ़ा जान पड़ता है' ॥ ५ ॥ जिन लोगोंकी आयु इनके लौटनेकी अवधिरूप जलमें मीनके समान हो रही है वे धन्य हैं। तुलसीदास कहते हैं, जिनका प्रभुमें सद्भाव है वे लोग भी धन्य हैं ॥ ६ ॥ राग आसावरी [ २९ ] सजनी ! हैं कोउ राजकुमार । पंथ चलत मृदु पद-कमलनि दोउ सील-रूप-आगार ॥ १ ॥ आगे राजिवनैन स्याम-तनु, सोभा अमित अपार । डारौं वारि अंग-अंगनपर कोटि-कोटि सत मार ॥ २ ॥
२०१ अयोध्याकाण्ड पाछें गौर किसोर मनोहर लोचन-बदन उदार । कटि तूनीर कसे, कर सर-धनु, चले हरन छिति-भार ॥ ३ ॥ जुगुल बीच सुकुमारि नारि इक राजति बिनहि सिंगार । इंद्रनील, हाटक, मुकुतामनि जनु पहिरे महि हार ॥ ४ ॥ अवलोकहु भरि नैन, बिकल जनि होहु, करहु सुबिचार । पुनि कहँ यह सोभा, कहँ लोचन, देह-गेह-संसार ? ॥ ५ ॥ सुनि प्रिय-बचन चितै हित कै रघुनाथ कृपा-सुखसार । तुलसिदास प्रभु हरे सबन्हिके मन, तन रही न सँभार ॥ ६ ॥ अरी सजनी ! ये कोई राजकुमार हैं। यह दोनों ही शील और रूपके भण्डार हैं तथा मार्गमें मृदुल चरणकमलोंसे पैदल ही चल रहे हैं ॥ १ ॥ आगे तौ कमलनयन और श्याम शरीरवाले कुँवर हैं, जिनकी शोभा अतुलित और अपार है। उनके एक-एक अङ्गपर मैं सैकड़ों-करोड़ कामदेव निछावर करती हूँ ॥ २ ॥ और पीछे गौरवर्ण मनोहर किशोरावस्थावाले लाल हैं। उनके नेत्र और मुख भी बड़े ही सुन्दर हैं। वे कमरमें तरकस और हाथोंमें धनुष-बाण लेकर मानों पृथ्वीका भार उतारनेके लिये ही जा रहे हैं ॥ ३ ॥ दोनोंके बीचमें एक सुकुमारी नारी बिना ही शृङ्गार किये विराज रही है। ये तीनों मिलकर ऐसे जान पड़ते हैं मानों पृथ्वी इन्द्रनील, सुवर्ण और मुक्ता मणिका हार पहने हुए हों ॥ ४ ॥ इन्हें तनिक नेत्र भरकर देख लो, व्याकुल मत होओ, तनिक विचार लो—'फिर कहां यह शोभा मिलेगी ?' कहाँ हमारे नेत्र होंगे और कहाँ इस संसारमें ये घर और शरीर रहेंगे ?' ॥ ५ ॥ ये प्रिय वचन सुनकर कृपा और सुखके सारस्वरूप भगवान् रामने उनकी ओर प्रीतिपूर्वक देखा । तुलसीदास
गीतावली २०२ कहते हैं, ऐसा करके प्रभुने उनके चित्त चुरा लिये और उन्हें अपने शरीरकी भी सुधि न रही ॥ ६ ॥ [ ३० ] देखु री सखी ! पथिक नख-सीख नीके हैं। नीले पीले कमल-से कोमल कलेवरनि, तापस हू बेष किये काम कोटि फीके हैं ॥ १ ॥ सुकृत-सनेह-सील-सुषमा-सुख सकेलि, बिरचे बिरंचि किधौं अमिय, अमीके हैं। रूपकी-सी दामिनी सुभामिनी सोहति संग, उमहु रमातें आछे अंग अंग ती के हैं ॥ २ ॥ बन-पट कसे कटि, तून-तीर-धनु धरे, धीर, बीर, पालक कृपालु सबहीके हैं। पानही न, चरन-सरोजनि चलत मग, कानन पठाए पितु-मातु कैसे ही के हैं ॥ ३ ॥ आली अवलोकि लेहु, नयननिके फल येहु, लाभके सुलाभ, सुखजीवन-से जी के हैं। धन्य नर-नारि जे निहारि बिनु गाहक हू, अपने अपने मन मोल बिनु बीके हैं ॥ ४ ॥ बिबुध बरखि फूल हरषि हिये कहत, ग्राम-लोग मगन सनेह सीय-पी के हैं। जोगीजन-अगम दरस पायो पाँवरनि, प्रमुदित मन सुनि सुरप-सची के हैं ॥ ५ ॥ प्रीतिके सुबालक-से लालत सुजन मुनि, मग चारु चरित लषन-राम-सी के हैं। जोग न बिराग-जाग, तप न तीरथ-त्याग, एही अनुराग भाग खुले तुलसी के हैं ॥ ६ ॥
अरी सखि ! देख, ये पथिक तो नखसे सिखतक सुन्दर हैं। ये अपने नीले और पीले कमलोंमें समान कोमल शरीरोंसे तापस वेश बनाये रहनेपर भी करोड़ों कामदेवोंको फीकाकर रहे हैं ॥ १ ॥ कहीं विधाताने सुकृत, स्नेह, शील, सुषमा और सुख—इन सबको एकत्र करके तो इन्हें नहीं रचा है ? ये तो अमृतके भी अमृत हैं। इनके साथ रूपमें विद्युत्के समान एक स्त्री शोभायमान है, उसके प्रत्येक अङ्ग उमा और रमासे भी उत्कृष्ट हैं ॥ २ ॥ कमरमें ये वनवासियोके-से वस्त्र पहने तथा तरकस,'तीर और धनुष धारण किये हैं। ये बड़े ही धीर-वीर, कृपालु और सभीका पालन करने- वाले हैं। इनके चरणोंमें जूतियाँ भी नहीं हैं, ये मार्गमें अपने सुकुमार चरणकमलोंसे ही चल रहे हैं। अहो ! इनके माता-पिता न जाने कैसे कठिन हृदयके हैं, जिन्होंने इन्हें वनमें भेज दिया है ॥ ३ ॥ अरी आली ! अच्छी तरह देख लो, यही तो नेत्रोंका फल है। यह लाभका भी लाभ है और चित्तका सुखमय जीवन-सा है। वे नर-नारी धन्य हैं जो इन्हें देखकर बिना ग्राहक ही इनके हाथ अपने-आप बेमोल बिक गये हैं ॥ ४ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर हृदयमें हर्षित हो कहते हैं, देखो, ये गाँवके लोग श्रीसीतापतिके स्नेहमें मग्न हो रहे हैं। जिसका मिलन योगियोंको भी कठिन है, इन बेचारे पामर प्राणियोंने उन्हीं प्रभुका दर्शन प्राप्त किया, प्रभुका वनगमन सुनकर इन्द्र और शचीका चित्त भी परम आनन्दित हो रहा है ॥ ५ ॥ मार्गमें राम, लक्ष्मण और सीताके जो पवित्र चरित्र होते हैं वे प्रीतिके बालकोंके समान हैं, जिन्हें सुजन मुनिजन (पिताके समान) लालन करते हैं। योग, वैराग्य, यज्ञ, तप, तीर्थ
गीतावली २०४ और त्याग आदिका अभाव होनेपर भी इसी अनुरागके कारण तुलसी दासके भी भाग्य खुल गये हैं॥ ६॥ [ ३१ ] रीति चलिबेकी चाहि, प्रीति पहिचानिकै। आपनी आपनी कहैं, प्रेम-परबस अहैं, मंजु मृदु बचन सनेह-सुधा सानिकै ॥ १ ॥ साँवरे कुँवरके बराइकै चरनके चिह्न, बधू पग धरति कहा धौं जिय जानिकै। जुगल कमल-पद-अंक जोगवत जात, गोरे गात कुँवर महिमा महा मानिकै ॥ २ ॥ उनकी कहनि नीकी, रहनि लषन-सी की, तिनकी गहनि जे पथिक उर आनिकै। लोचन सजल, तन पुलक, मगन मन, होत भूरिभागी जस तुलसी बखानिकै ॥ ३ ॥ ग्रामके नर-नारी राम, लक्ष्मण और सीताजीके चलनेकी रीति देखकर और उनकी प्रीति पहचानकर, प्रेमके वशीभूति हो, स्नेह- सुधामें डुबोकर अपनी-अपनी बुद्धिसे ये मनोहर और मृदुल वचन कह रहे हैं ॥ १ ॥ 'देखो, यह बहू न जाने क्या समझकर साँवले कुँवरके चरण-चिह्नोंको बचाकर पाँव रखती है और गोरे शरीरवाले कुँवर मनमें अत्यन्त महिमा मानकर दोनोंहीके चरणकमलोंके चिन्होंको सँभालते हुए चलते हैं' ॥ २ ॥ उन ग्राम्यपुरुषोंका कथन अच्छा है, सीता और लक्ष्मणका रहन-सहन अच्छा है, तथा जो उन पथिकोंको हृदयमें धारण कर सजल नयन, पुलकित शरीर
अयोध्याकाण्ड २०५ और मनमें मग्न हो जाते हैं, उनका ग्रहण करना अच्छा है। तुलसीदास भी उनके सुयशका वर्णन् करके बड़भागी हो रहा है ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३२ ] जेहि जेहि मग सिय-राम-लखन गए, तहँ तहँ नर-नारि बिनु छर छरिगे । निरखि निकाई-अधिकाई बिथकित भए, बच बिय-नैन-सर सोभा-सुधा भरिगे ॥ १ ॥ जोते बिनु, बए बिनु, निफन निराए बिनु, सुकृत-सुखेत सुख-सालि फूलि फरिगे । मुनिहु मनोरथको अगम अलभ्य लाभ, सुगम सो राम लघु लोगनिको करिगे ॥ २ ॥ लालची, कौड़ीके कूर पारस परे हैं पाले, जानत न को हैं, कहां कीबो सो बिसरिगे । बुधि न बिचार, न बिगार न सुधार सुधि, देह-गेह-नेह-नाते मनसे निसरिगे ॥ ३ ॥ बरषि सुमन सुर हरषि हरषि कहैं, 'अनायास भवनिधि नीच नीके तरिगे' । सो सनेह समउ सुमिरि तुलसीहूके-से भली भाँति भले पैंत, भले पाँसे परिगे ॥ ४ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता जिस-जिस मार्गसे होकर निकले वहाँ-वहाँके स्त्री-पुरुष बिना छरे ही छर गये [अर्थात् जिस प्रकार धान छरनेसे उसका तुष दूर हो जाता है और स्वच्छ चावल रह जाता है, उसी प्रकार मार्गस्थ स्त्री-पुरुष बिना अभ्यासके ही पाप-
गीतावली २०६ पुण्यों से मुक्त होकर शुद्ध हो गये]। उनकी सुन्दरताकी अधिकता देखकर वाणी शिथिल हो गयी तथा शरीररूप भूमिके दोनों नयनरूप सरोवर शोभारूप अमृतसे पूर्ण हो गये ॥ १ ॥ सुकृतरूप खेतमें सुखरूप धान बिना जोते, बोये और अच्छी तरह निराये ही फूल- फल गये। जो लाभ मुनियोंके मनोरथकी पहुँचसे भी बाहर और अत्यन्त दुर्लभ था, उसे श्रीरघुनाथजी छोटे-छोटे लोगोंके लिये भी सुलभ कर गये ॥ २ ॥ जो बेचारे कौड़ियों (तुच्छ देवताओंके दर्शन) के लिये ललचा रहे थे, उनके पाले पारस (रामदर्शन) पड़ गया। वे यह भी नहीं जानते कि 'ये हैं कौन ? और इनके साथ क्या करना चाहिये' यह भी वे भूल गये। उन्हें न बुद्धि ही रही और न विचार ही; और न कुछ बिगाड़-सुधारकी ही सुधि रही। उनके मनसे देह, गेह और स्नेहके सभी नाते निकल गये ॥ ३ ॥ देवतालोग फूल बरसाकर प्रसन्न हो-होकर कहते हैं—'अहो, ये तुच्छ लोग भी बिना प्रयासके ही खूब संसार-सागरको पार कर गये।' उस स्नेह और आनन्दका स्मरणकर तुलसीदास-जैसोंके भी अच्छी तरह अच्छे पाँसे पड़ गये ॥ ४ ॥ [ ३३ ] बोले राज देनेको, रजायसु भो काननको, आनन प्रसन्न, मन मोद, बड़ो काज भो। मातु-पिता-बन्धु-हित आपनो परम हित, मोको बीसहूकैं ईस अनुकूल आजु भो ॥ १ ॥ असन अजीरनको समुझि तिलक तज्यो, बिहिन-वावनु भले सूखेको सुनाजु भो।
धरम-धुरोन धीर बीर रघुबीरजूको, कोटि राज सहित भरतजूको राजु भो ॥ २ ॥ ऐसी बातें कहत सुनत मग-लोगनकी, चले जात बंधु दोउ मुनिको सो साज भो । ध्याइबेको, गाइबेको, सेइबे सुमिरिबेको, तुलसीको सब भाँति सुखद समाज भो ॥ ३ ॥ [मार्गस्थ स्त्री-पुरुष कहते हैं—] राजाने राज्य देनेके लिये कहा था, इतनेहीमें वन जानेकी आज्ञा हो गयी । किन्तु इसपर रघुनाथजीका तो मुख खिल उठा और मन प्रसन्न हो गया । ये सोचने लगे—'यह बड़ा भारी काम बना, इसमें माता-पिता और भाईका भी हित है और मेरा भी परम कल्याण है, आज विधाता मुझपर बीसों बिस्वे प्रसन्न हुआ है, ॥ १ ॥ फिर इन्होंने राजतिलकको अजीर्णपरका भोजन (अनिष्टकारी) समझकर त्याग दिया तथा वनगमनको भूखेके लिये नाजके समान हितकारी समझकर स्वीकार कर लिया। इस प्रकार परम धीर-वीर, धर्मधुरीण रघुनाथजीके लिये भरतजीका राजतिलक करोड़ों राज्याभिषेकोंके समान हुआ ॥ २ ॥ मार्गस्थ पुरुषोंके द्वारा कही हुई ऐसी बातें सुनते हुए मुनियोंका सा साज सजाये दोनों भाई चले जा रहे हैं । तुलसीदासको तो ध्यान करने, गाने, सेवन करने और स्मरण करनेके लिये यह समाज सभी प्रकार सुखदायक हुआ ॥ ३ ॥ [ ३४ ] सिरिस-सुमन-सुकुमारि, सुखमाकी सींव, सीय राम बड़े ही सकोच संग लई है।
गीतावली २०८ भाईके प्रान समान, प्रियाके प्रानके प्रान, जानि बानि प्रीति रीति कृपासील मई है ॥ १ ॥ आलबाल-अवध सुकामतरु कामबेलि, दूरि करि अकई विपत्ति-बेलि बई है । आप, पति, पूत, गुरुजन, प्रिय परिजन, प्रजाहूको कुटिक दुसह दशा दई है ॥ २ ॥ पंकजसे पगनि पानह्रौं न, परुष पंथ, कैसे निबहे हैं, निबहेंगे, गति नई है ? । एही सोच-संकट-मगन मग-नर-नारि, सबकी सुमति राम-राग-रँग रई है ॥ ३ ॥ एक कहै, बाम बिधि दाहिनो हमको भयो, उत कीन्हीं पीठि, इतको सुडीठि भई है । तुलसी सहित बनबासी मुनि हमरिऔ, अनायास अधिक अघाइ बनि गई है ॥ ४ ॥ जो भाई लक्ष्मणके प्राणोंके समान और प्रियतमा सीताके प्राणोंके भी प्राण हैं उनकृपाशीलमय रघुनाथजीनेस्वभाव तथा प्रीतिकी रीति जानकर ही बड़े संकोचसे सिरससुमनके समान सुकुमारी तथा सौन्दर्यकी सीमा श्रीसीताजीको अपने साथ लिया है ॥ १ ॥ कैकेयीने अयोध्यारूप आलबालसे [राम और सीतारूप] कल्पवृक्ष एवं कल्पलताको निकालकर उसमें विपत्तिकी बेल बो दी है । इस प्रकार उसने अपने लिये तथा पति, पुत्र, गुरुजन, प्रिय-कुटुम्बियों एवं प्रजा- वर्गके लिये भी अत्यन्त कुटिल और दुःसह दशा उपस्थित कर दी है ॥ २ ॥ मार्ग बड़ा कठिन है और पैरोंमें जूते भी नहीं हैं; अतः अपने कमल-जैसे कोमल चरणोंसे उन्होंने कैसे तो अबतक निर्वाह
२०६ अयोध्याकाण्ड किया है और कैसे आगे करेंगे; यह तो एक नयी लीला देखनेमें आ रही है। मार्गके सारे नर-नारी इसी सोच और संकटमें पड़े हुए हैं, उन सभीकी बुद्धि भगवान् रामके अनुराग-रूप रंगमें रँग गयी है ॥ ३ ॥ कोई कहते हैं—'यह वाम विधाता हमारे लिये तो अनुकूल ही है, इसने उधरहै पीठ कर ली (विमुख) है तो हमारी ओर तो इसकी सुदृष्टि ही जान पड़ती (अनुकूल) है।' अतः तुलसीदासजी कहते हैं, बनवासी मुनियोंके सहित हमारी बात तो अनायास ही खूब अच्छी तरह बन गयी है ॥ ४ ॥ राग गौरी [ ३५ ] नीके कै मैं न बिलोकन पाए। सखि ! यहि मग जुग पथिक मनोहर, बधु बिधु-बदनि समेत सिधाए ॥ १ ॥ नयन सरोज, किसोर बयस बर, सीस जटा रचि मुकुट बनाए। कटि मुनिबसन-तून, धनु-सर कर, स्यामल-गौर, सुभाय सोहाए ॥ २ ॥ सुंदर बदन, बिसाल बाहु-उर, तनु-छबि कोटि मनोज लजाए। चितवत मोहि लगी चौंधी-सी, जानौं न, कौन, कहाँ तें धौं आए ॥ ३ ॥ मनु गयो संग, सोचबस लोचन मोचत बारि, कितौ समुझाए। तुलसिदास लालसा दरसकी सोइ पुरवै, जेहि आनि देखाए ॥ ४ ॥ 'अरी सखि ! इस मार्गसे जो दो मनोहर पथिक एक चन्द्रमुखी स्त्रीके सहित गये हैं, उन्हें मैं तो अच्छी तरह देख भी न सकी ॥ १ ॥ उनके नेत्र कमलके समान थे, सुन्दर किशोर अवस्था थी, सिरपर जटाओंसे रचकर मुकुट बनाये हुए थे, कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और गी० १४—
तरकस तथा हाथोंमें धनुष-बाण धारण किये थे । वे श्याम-गौरवर्ण और स्वभावसे ही शोभायमान थे ॥ २ ॥ उनका मनोहर मुखमण्डल था, विशाल वक्षःस्थल और भुजाएँ थीं तथा अपने शरीरकी कान्तिसे वे करोड़ों कामदेवोंको लज्जित करते थे । उन्हें देखकर मुझे तो चौंधी- सी लग गयी; मैं तो यह भी नहीं जान सकी कि वे कौन थे और कहांसे आये थे ? ॥ ३ ॥ मेरा मन तो उन्हींके साथ चला गया, नेत्र भी सोचवश जल बरसा रहे हैं । मैंने चित्तको बहुत कुछ समझाया है तो भी उनके दर्शनकी लालसा लगी हुई है, अब इसे वही पूर्ण करेगा जिसने उन्हें एक बार यहाँ लाकर दिखा दिया था' ॥ ४ ॥ [ ३६ ] पुनि न फिरे दोउ बीर बटाऊ । स्यामल-गौर, सहजसुंदर, सखि ! बारक बहुरि बिलोकिबे काऊ ॥ १ ॥ कर-कमलनि सर, सुभग सरासन, कटि मुनिबसन-निषंग सोहाए । भुज प्रलंब, सब अंग मनोहर, धन्य सो जनक-जननि जेहि जाए ॥ २ ॥ सरद-बिमल बिधु-बदन, जटा सिर, मंजुल अरुन सरोरुह-लोचन । तुलसिदास मनमय मारगमें राजत कोटि-मदन-मदमोचन ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! वे वीर बटोही इस मार्गसे फिर नहीं लौटे ? वे श्याम-गौर कुँवर स्वभावसे ही सुन्दर थे । क्या हम उन्हें एक बार फिर देख सकेंगी ? ॥ १ ॥ उनके कर-कमलोंमें बाण और सुन्दर धनुष थे तथा कमरमें मुनियोंके-से वस्त्र और तरकस शोभायमान थे । उनकी भुजाएँ लम्बी-लम्बी और सभी अङ्ग अत्यन्त मनोहर थे । वे माता-पिता, जिन्होने उन्हें जन्म दिया है, धन्य हैं' ॥ २ ॥
२११ अयोध्याकाण्ड तुलसीदासजी कहते हैं, जिनका शरच्चन्द्रके समान सुन्दर मुखमण्डल है, सिरपर जटाएँ हैं तथा अरुण कमलके समान अति सुन्दर नेत्र हैं, वे करोड़ों कामदेवोंके मदका मथन करनेवाले प्रभु हमारे मनोमय मार्गमें विराजमान हैं ॥ ३ ॥ राग केदारा [ ३७ ] आली ! काहू तौ बूझौ न पथिक कहाँ धौं सिधैहैं । कहाँतें आए हैं, को हैं, कहा नाम स्याम-गोरे, काज कें कुसल फिरि एहि मग ऐहैं ? ॥ १ ॥ उठति बयस, मसि भींजति, सलोने सुठि, सोभा-देखवैया बिनु बित्त ही बिकैहैं । हिये हेरि हेरि लेत लोनी ललना समेत, लोयननि लाहु देत जहाँ जहाँ जैहैं ॥ २ ॥ राम-लषन-सिय-पंथिकी कथा पृथुल, प्रेम बिथकीं कहति सुमुखि सबै हैं । तुलसी तिन्ह सरिस तेऊ भूरिभाग जेऊ, सुनि कै सुचित तेहि समैं समैहैं ॥ ३ ॥ 'अरी आली ! किसीसे पूछो तो 'ये पथिक कहाँ जायेंगे ? कहाँसे आये हैं ? कौन हैं ? इन श्याम-गौर कुमारोंके नाम क्या हैं ? और अपना कार्य समाप्त करनेपर फिर कुशलपूर्वक इसी मार्गसे लौटेंगे या नहीं ? ॥ १ ॥ इनकी उठती हुई अवस्था है, शरीरपर यौवनका रंग चढ़ रहा है, देखनेमें बड़े ही सुहावने और सरल जान पड़ते हैं, इनकी शोभा देखनेवाले बिना मोल ही बिके जा रहे
हैं। इनके साथकी जो सुघड़ ललना है वह तो देखकर ही लोगोंके चित्तको चुरा लेती है। ये जहाँ-जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँके लोगोंको इसी प्रकार नेत्रोंका लाभ देंगे' ॥ २ ॥ इस प्रकार सभी सुन्दरियाँ प्रेममें विह्वल होकर बटोही राम, लक्ष्मण और सीताकी भारी कथा कह रही हैं। तुलसीदास कहते हैं, जो लोग उन कथाओंको समाहित चित्तसे सुनकर उन्हींमें मन लगाये रहते हैं, वे भी उन ग्रामनारियोंके समान ही सौभाग्यवान् हैं ॥ ३ ॥ [ ३८ ] बहुत दिन बीते सुधि कछु न लही। गये जो पथिक गोरे-साँवरे सलोने, सखि ! संग नारि सुकुमारि रही ॥ १ ॥ जानि-पहिचान बिनु अपुनें, आपुनेहुतें, प्रानहुतें प्यारे प्रियतम उपही। सुधाके सनेहूके सार लै सँवारे बिधि, जैसे भावते हैं भाँति जाति न कही ॥ २ ॥ बहुरि बिलोकिबे कबहुक, कहंत, तनु पुलक, नयन जलधार बही। तुलसी प्रभु सुमिरि ग्रामजुवती सिथिल, बिनु प्रयास परीं प्रेम सही ॥ ३ ॥ 'अरी सखि ! बहुत दिन बीत गये, परंतु अभीतक जो साँवले- गोरे सुन्दर पथिक गये थे और जिनके साथ एक सुकुमारी स्त्री भी थी, उनकी कुछ भी सुधि नहीं मिली ॥ १ ॥ वे परदेशी—जान पहचान न होनेपर भी—अपनेसे, अपने प्रियजनोंसे तथा अपने
२१३ अयोध्याकाण्ड प्राणोंसे भी अधिक प्रिय जान पड़ते थे। उन्हें विधाताने अमृत और स्नेहका भी सार लेकर रचा है। वे जैसे प्रिय लगते हैं वह हमसे कहा नही जाता ॥ २ ॥ क्या उन पथिकोंको हम फिर भी देख सकेंगी,—ऐसा कहते ही उनके शरीर पुलकित हो जाते हैं और नेत्रोंसे जलकी धाराएँ बहने लगती हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुका स्मरणकर ग्रामीण स्त्रियाँ शिथिल हो गयी हैं और बिना परिश्रम ही प्रेममें सच्ची सिद्ध हो गयी हैं ॥ ३ ॥ [ ३९ ] आली री ! पथिक जे एहि पथ परौं सिधाएं। ते तौ राम-लखन अवधतें आए ॥ १ ॥ संग सिय सब अंग सहज सोहाए। रति-काम-ऋपति कोटिक लजाए ॥ २ ॥ राजा दसरथ, रानी कौसिला जाए। कैकेयी कुचाल करि कानन पठाए ॥ ३ ॥ बचन कुभामिनीके भूपहि क्यों भाए ? हाय ! हाय ! राय बाम बिधि भरमाए । ४ ॥ कुलगुर सचिव काहू न समुझाए। कांच-मनि लै अमोल मानिक गवाँए ॥ ५ ॥ भाग मग-लोगनिके, देखन् जे पाए। तुलसी सहित जिन गुन-गन गाए ॥ ६ ॥ अरी आली ! परसों जो पथिक इस मार्गसे गये थे, उनका नाम राम-लक्ष्मण था और वे अयोध्यापुरीसे आये थे ॥ १ ॥ उनके साथ सीताजी थीं। वे स्वभावसे ही सब अङ्गोंसे शोभायमान थे। उन्हें देखकर करोड़ों रति, कामदेव और ऋतुराज (बसन्त)
गीतावली २१४ लज्जित होते थे ॥ २ ॥ उन्हें राजा दशरथ और रानी कौसल्या जन्म दिया है। कैकेयीने कुचाल करके उन्हें वनमें भेज दिया ॥ ३ ॥ भला, उस दुष्टा स्त्रीके वचन राजाको क्यों अच्छे लगे ? हाय ! हाय ! ! राजाको वाम विधाताने भ्रममें डाल दिया ! ॥ ४ ॥ उन्हें कुलगुरु या मन्त्रियोंमेंसे भी किसीने नहीं समझाया; उन्होंने कांचका मनका लेकर अमूल्य मणिको खो दिया ! ॥ ५ ॥ मार्गके लोगोंके बड़े ही भाग्य हैं जिन्होंने उन्हें देखा और तुलसीदासके सहित वे भी बड़े भाग्यवान् हैं, जिन्होंने इनके गुण गाये हैं ॥ ६ ॥ [ ४० ] सखि ! जब तें सीता-समेत देखे दोउ भाई । तबतें परै न कल, कछू न सोहाई ॥ १ ॥ नखसिख नीके, नीके निरखि निकाई । तन-सुधि गई, मन अनत न जाई ॥ २ ॥ हेरनि-हँसनि हिय लिये हैं चोराई । पावन-प्रेम-बिबस भईं हौं हराई ॥ ३ ॥ कैसे पितु-मातु, प्रिय परिजन-भाई । जीवत जीवके जीवन बनहि पठाई ॥ ४ ॥ समउ सो चित करि हित अधिकाई । प्रीति ग्रामबधुनकी तुलसिहु गाई ॥ ५ ॥ अरी सखि ! जबसे सीताजीके सहित दोनों भाइयोंको देखा है तबसे हमें चैन नहीं पड़ता और न कुछ सुहाता ही है ॥ १ ॥ वे नखसे शिखातक सुन्दर थे, उनकी सुन्दरताको अच्छी तरह देखकर
२१५ अयोध्याकाण्ड शरीरकी सुधि जाती रही है और अब मन किसी दूसरी जगह नहीं जाता ॥ २ ॥ उनकी चितवन और हँसीने मेरे चित्तको चुरा लिया है। उनके पवित्र प्रेमवश मैं बिरानी (दूसरेकी) हो रही हूं [अब अपनेपर मेरा अधिकार नहीं है]॥ ३ ॥ वे माता, पिता, प्रिय परिजन और भाई न जाने कैसे हैं ? जिन्होंने स्वयं जीवित रहते जीवोंके जीवन इन रघुनाथजीको वनमें भेज दिया है॥ ४॥ उस समय- को चित्तमें लानेसे प्रेम बढ़ता है। अतः तुलसीदासने भी ग्राम- वधुओंकी उस प्रीतिको गाया है॥ ५॥ राग केदारा [ ४१ ] जबतें सिधारे यहि मारग लषन-राम, जानकी सहित, तबतें न सुधि लही है। अवध गए धौं फिरि, कैंधौं चढ़े बिंध्य गिरि, कैंधौं कहुँ रहे, सो कछू, न काहू कही है ॥ १ ॥ एक कहै, चित्रकूट निकट नदीके तीर, परनकुटीर करि बसे, बात सही है। सुनियत, भरत मनाइबेको आवत हैं, होइगी पै सोई, जो बिधाता चित्त चही है ॥ २ ॥ सत्यसंध, धरम-धुरौन रघुनाथजूको, आपनी 'निबाहिबे, नृपकी निरबही है। दस-चारि बरिस बिहार बन पदचार, करिबे पुनीत सैल, सर-सरि, मही है ॥ ३ ॥ मुनि-सुर-सुजन-समाजके सुधारि काज, बिगरि बिगरि जहाँ-जहाँ जाकी रही है ।